मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६६ मनुस्मृति। प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्च दद्याच्छतानि च ॥ २८५ ॥ अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा । मणीनामपवेधे च दण्डः प्रथमसाहसः ॥ २८६ ॥ समैर्हि विषमं यस्तु चरेद्वै मूल्यतोऽपि वा । समाप्नुयाद्दमं पूर्वं नरो मध्यममेव वा ॥ २८७ ॥ बन्धनानि च सर्वाणि राजा मार्गे निवेशयेत् । दुःखिता यत्र दृश्येरन् विकृता पापकारिणः ॥ २८८ ॥ प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च पूरकम् । द्वाराणां चैव भेत्तारं क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ २८९ ॥ अभिचारेषु सर्वेषु कर्त्तव्यो द्विशतो दमः । मूलकर्मणि चानाप्ते कृत्यासु विविधासु च ॥ २९० ॥ अबीजविक्रयी चैव बीजोत्कृष्टं तथैव च । मर्यादा भेदकश्चैव विकृतं प्राप्नुयाद्वधम् ॥ २९१ ॥ चिकित्सा करनेवाले उलटी चिकित्सा करें तो पशु आदि के विषय में ढाई सौ पण और मनुष्यों के विषय में पांच सौ पण दण्ड करे। नदी के पुलका काठ, राजपताका का दण्डा और मूर्तियों को तोड़नेवाला, उन सबको फिर बनवावे और पांच सौ पण दण्ड देवे। अच्छी वस्तु को दूषित करने, तोड़ने और मणियों के बुरा बेधने में, ढाई सौ पण दण्ड करे। जो समान-मूल्य की वस्तुओं से न्यूनाधिक मूल्य की वस्तुओं का व्यवहार करे, वह मनुष्य पूर्व वा मध्यम साहस दण्ड पावे। राजा मार्ग में बंदीघर को बनवावे जहां दुःखी और पापी सबको दीख पड़े। लफील को तोड़नेवाले और उसकी खाई को भरनेवाले और राजद्वारों को तोड़नेवालों को तुरंत देश से निकालदेय । सब तरह के मारणों से यदि जिस