भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 511

नवां अध्याय । ३७१ समुद्र को न पीने योग्य और चन्द्रमा को क्षयरोगी करके पीछे पूर्ण किया उन ब्राह्मणों को कुपित करके कौन नष्ट न होजायगा ? जो ब्राह्मण रुष्ट होकर दूसरे लोक और लोकपालों को रच सकते हैं और देवताओं को शाप देकर नीचयोनि में डाल सकते हैं, उन को दुःख देकर कौन बढ़ सकता है ? ॥ ३१३-३१५ ॥ यानुपाश्रित्य तिष्ठन्ति लोका देवाश्च सर्वदा । ब्रह्म चैव धनं येषां को हिंस्यात्तान् जिजीविषुः॥३१६॥ अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥ ३१७ ॥ श्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति । हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्धते ॥ ३१८ ॥ एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु । सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि तत् ॥ ३१६ ॥ स्वर्गादि लोक और देवता, जिनके आश्रय से टिके रहते हैं और वेद ही जिन का धन है उन ब्राह्मणों को कौन मारना चाहेगा? जैसे अग्नि वेदमन्त्रों से, या दूसरे प्रकार से प्रकट हो पर महान् देवता है, वैसे ब्राह्मण विद्वान् या मूर्ख हो महान् देवता है । ते- जस्वी अग्नि श्मशान में भी दूषित नहीं होता किंतु यज्ञ में हवन किया हुआ फिर वृद्धि को प्राप्त होता है । इसी प्रकार ब्राह्मण सब निंदित कामों के करने पर भी सर्वथा पूज्य हैं, महान् देवता हैं ॥ ३१६-३१६ ॥ क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणान् प्रतिसर्वशः । ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात्क्षत्रं हि ब्रह्मसंभवम् ॥ ३२० ॥ अद्द्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ ३२१ ॥