मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 527, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशवां अध्याय । ३८७ है वैसे ही ब्राह्मण शूद्रता को पाता है । ऐसे ही क्षत्रिय से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र छठी पीढ़ी में शूद्र होता है और वैश्य से शूद्रा में उ- त्पन्न पांचवीं पीढ़ी में शूद्र होता है। ब्राह्मण से शूद्रा में और शूद्र से ब्राह्मणी में दैवेच्छा से पुत्र पैदा हो, उनमें श्रेष्ठता इस प्रकार है- ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र यज्ञादि कर्म करताहो तो 'आर्य' कहलाता है। और शूद्र से ब्राह्मणी में उत्पन्न हुआ, 'अनार्य' कह - लाता है। पहला नीच जाति में होने से और दूसरा प्रतिलोम होने से दोनों संस्कार के अयोग्य हैं। यह धर्म की मर्यादा है ॥ ६४-६८॥ सुवीजं चव सुक्षेत्रे जातं संपद्यते यथा । तथाऽऽर्याज्जात आर्यायां सर्वं संस्कारमर्हति ॥ ६६ ॥ वीजमेके प्रशंसन्ति क्षेत्रमन्ये मनीषिणः । वीजक्षेत्रे तथैवान्ये तत्रेयं तु व्यवस्थितिः ॥ ७० ॥ अक्षेत्रे वीजमुत्सृष्टमन्तरैव विनश्यति । अवीजकमपि क्षेत्रं केवलं स्थण्डिलं भवेत् ॥ ७१ ॥ अच्छा बीज अच्छे खेत में बोने से जैसे अच्छा होता है, वैसे आर्य से आर्या में पैदा हुआ पुत्र सब संस्कार के योग्य होता है। कोई वि- द्वान् बीज की प्रशंसा करते हैं, कोई क्षेत्र की प्रशंसा करते हैं, कोई बीज और क्षेत्र दोनों की प्रशंसा करते हैं, उसमें व्यवस्था यों है- ऊसर में बोया बीज बीच ही में नष्ट हो जाता है और विना बीज के खेत कोरा-सपाट पड़ा रहता है ॥ ६६-७१ ॥ यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोऽभवन् । पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते ॥ ७२ ॥ अनार्यमार्यकर्माणमार्यं चानार्यकर्मिणम् । संप्रधार्याब्रवीद्धाता न समौ नासमाविति ॥ ७३ ॥