मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ५१ से 'पुनर्विवाह' अथवा 'नियोग' का विधायक नहीं हो सकता, किंतु व्यवस्था की अपेक्षा रखता है। जैसा— वाग्दान के बाद पाणिग्रहण के पहले अपति, अर्थात् पतिभिन्न पति सदृश वर; यदि लापता हो जाय, वा मर जाय, वा संन्यासी हो जाय, वा नपुंसक हो जाय, वा महापातक से दूषित हो जाय इन पांच आपत्तियों में 'च' कार से यदि विकर्मा, वा विरुद्ध- धर्मा, वा समान गोत्र, वा समान प्रवर ज्ञात होय तो कन्या दूसरे वर को दी जाय। यही आशय धर्माधिकारि नन्द पण्डित ने विद्वन्मनोहरा में दिखलाया है । नियोगकर्म । यह इन्द्रियदौर्बल्य के कारण कलि में सर्वथा असंभव है। इसीलिये वृहस्पति ने कहा है— 'उक्ता नियोगा मुनिना निषिद्धाः स्वयमेव तु । युगक्रमादशक्योऽयं कर्तुमन्यैर्विधानतः ॥' इत्यादि । और मनु ने भी कहा है— 'अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।' ( ९ अ. ६६ श्लो. ) नियोग कर्म तो दूर रहा, इस समय भी पुनर्विवाह त्रैवर्णिक- कातिरिक्त शूद्र जाति में हीनदृष्टि से व्यवहार्य है। भले ही त्रैवर्णिक-महाशय उसकी कोशिश में रहें। और "अक्षमाला वशिष्ठेन—' ९ । २३ 'अजीगर्तः सुतं हन्तुं—' १० । १०५ १ 'अपति' ऐसा छेद करने से 'उत्पत्स्यमानपतित्ववान्' ऐसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है और नञ्समास होने से 'अपतौ' की साधुता भी हो जाती है। २ देखिये भारत में धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा पाण्डवों की उत्पत्ति के प्रकरण ।