भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 649 में से

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३६६ मनुस्मृति । उच्छिष्टमन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च । पुल्काश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदाः॥१२५॥ न शूद्रे पातकं किञ्चिन्न च संस्कारमर्हति । नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति न धर्मात्प्रतिषेधनम् ॥१२६॥ राजा वैश्यों से अन्नका आठवां भाग लेय और कार्षापण तक सराफ़ी के लाभ पर बीसवां भाग ले और शूद्र मज़दूर, कारी- गरोंसे काम कराले। ब्राह्मण की सेवासे शूद्र जीविका न करसके तो क्षत्रिय वा धनी वैश्य की सेवा करके, जीविका करे । परन्तु लोक परलोक दोनों में सुख चाहनेवाला शूद्र ब्राह्मण की सेवा करे । अमुक शूद्र अमुक ब्राह्मण का आश्रित है, ऐसा कहलाने से ही शूद्र कृतार्थ होता है। ब्राह्मणसेवाही शूद्र का प्रधान कर्म है । इस के सिवा उसके कर्म निष्फल हैं । ब्राह्मण सेवकों की काम करनेकी शक्ति, बुद्धिमानी और परिवार को देखकर योग्यतानुसार अन्न, वस्त्र, पुराने ओढ़ने, बिछौने वगैरह देवे । सेवक शूद्र को लसुन आदि अभक्ष्य-भक्षण से कोई पातक नहीं लगता । उनका उपनयन आदि संस्कार भी नहीं होता । अग्निहोत्रादि धर्म में उनका अधि- कार नहीं है और बिना मन्त्र होम आदि का निषेध भी नहीं है । वह भक्तिसे करसकता है ॥ १२०-१२६ ॥ धर्मेप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां वृत्तमनुष्ठिताः । मन्त्रवर्ज्यं न दुष्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवन्ति च ॥ १२७ ॥ यथा यथा हि सद्वृत्तमातिष्ठत्यनसूयकः । तथा तथेमं चामुं च लोकं प्राप्नोत्यनिन्दितः ॥१२८॥ शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसंचयः । शूद्रोऽपि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते ॥ १२६ ॥ एते चतुर्णां वर्णानामापद्धर्माः प्रकीर्तिताः ।

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