मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें४०४ , मनुस्मृति । ब्राह्मण मन्त्र जप, हवन से आपत्ति को दूर भगावैं । ब्राह्मण विहित कर्मों का अनुष्ठान करनेवाला, पुत्र-शिष्यों का शासन करनेवाला, प्रायश्चित्तादि को बतानेवाला और सब का मित्र कहा गया है। उसको कोई बुरी बात या रूखी बात न कहे। कन्या, युवती, थोड़ा पढ़ा, मूर्ख, रोगी और यज्ञोपवीत-संस्काररहित पुरुष अग्निहोत्र न करे। यदि ये सब होता किये जायँ तो खुद और जिसका अग्नि- होत्र हो वह दोनों नरकगामी होते हैं । इस कारण श्रौतकर्म में प्रवीण, वेदविशारद ही अग्निहोत्र का होता बन सकता है॥३३-३७॥ प्राजापत्यमदत्त्वाऽश्वमग्न्याधेयस्य दक्षिणाम् । अनाहिताग्निर्भवति ब्राह्मणो विभवे सति ॥ ३८ ॥ पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । नत्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजन्ते हि कथं च न ॥ ३६ ॥ इन्द्रियाणि यशः स्वर्गमायुः कीर्ति प्रजाः पशून् । हन्त्यल्पदक्षिणो यज्ञस्तस्मान्नाल्पधनो यजेत् ॥ ४० ॥ जो ब्राह्मण वैभव होने पर अग्न्याधान स्वीकार करके प्रजा- पति देवतावाले अश्व का दान नहीं करता वह अग्न्याधान फल को नहीं पाता। श्रद्धावान्, जितेन्द्रिय पुरुष, पुण्य के दूसरे कर्मों को करे। पर न्यून दक्षिणा देकर कोई यज्ञ न करें अर्थात् विना पूरी दक्षिणा यज्ञ न करना चाहिए। कम दक्षिणा देकर यज्ञ कराने से यज्ञ इन्द्रियाँ, यश, स्वर्ग, आयु, कीर्ति, प्रजा और पशुओं का नाश करती है। इस कारण थोड़े धनवाला यज्ञ न करे ॥३८-४०॥ अग्निहोत्र्यपविध्याग्नीन् ब्राह्मणः कामकारतः । चान्द्रायणं चरेन् मासं वीरहत्यासमं हि तत् ॥ ४१ ॥ ये शूद्रादधिगम्यार्थमग्निहोत्रमुपासते । ऋत्विजस्ते हि शूद्राणां ब्रह्मवादिषु गर्हिताः ॥ ४२ ॥