मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२२ मनुस्मृति।
आदि के प्रायश्चित्तों को न करसके तो एक एक कृच्छ्र व्रत करे। हजार हड्डीवाले जीवों की हत्या और बिना हड्डीवाले गाड़ी भर जीवों की हत्या में शूद्रहत्या का प्रायश्चित्त करे। अस्थि-हड्डी वाले प्राणियों की हत्या में ब्राह्मण को कुछ दक्षिणा दे और अस्थि- रहितों की हत्या में प्राणायाम से शुद्ध होता है। फल देनेवाले वृक्ष, गुल्म, बेल, लता और फूलवाले पौधों को व्यर्थ काटने पर सौ ऋचाओं का पाठ करे। सब भांति के अन्न, रस, फल-पुष्पादिमें पैदा हुए जीवों के वध में 'घृत-प्राशन' शुद्ध करता है ॥ १३६-१४४॥ कृष्टजानामोषधीनां उत्पन्नानां स्वयं वने । वृथालम्भेऽनुगच्छेद्रां दिनमेकं पयोव्रतः ॥ १४५ ॥ एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम् । ज्ञानाज्ञानकृतं कृत्स्नं शृणुतानाद्यभक्षणे ॥ १४६ ॥ खेत में या वन में स्वयं उत्पन्न औषधियों को व्यर्थ काटने पर एक दिन दूध पीकर गौ के पीछे फिरे। जान या अनजान में हिंसा से हुए सब पाप इन व्रतों से नष्ट होजाते हैं। अब अभक्ष्य-भक्षण का प्रायश्चित्त सुनो ॥ १४५-१४६ ॥ अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा संस्कारेणैव शुध्यति । मतिपूर्वमनिर्देश्यं प्राणान्तिकमिति स्थितिः ॥ १४७॥ अपः सुराभाजनस्था मद्यभाण्डस्थितास्तथा । पञ्चरात्रं पिबेत्पीत्वा शंखपुष्पीसृतं पयः ॥ १४८ ॥ स्पृष्ट्वा दत्त्वा च मदिरां विधिवत्प्रतिगृह्य च। शूद्रोच्छिष्टाश्च पीत्वापः कुशावारि पिबेत्त्र्यहम् ॥ १४६॥ ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमाघ्राय सोमपः । प्राणानप्सु त्रिरायम्य घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥ १५० ॥