मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 566, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें४२६ : मनुस्मृति । शय्या, आसन, फूल, मूल और फल की चोरी में पञ्चगव्य से शुद्धि होती है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड़, वस्त्र, चर्म और मांस चुराने पर तीन दिन उपवास करे। मणि, मोती, मूँगा, तांबा, चांदी, लोहा, कांस और पत्थर चुराने पर बारह दिन चावल की कनकी खावे ॥ १६१-१६८ ॥ कार्पासकीटजीर्णानां द्विशफैकशफस्य च । पक्षिगन्धौषधीनां च रज्जवाश्चैव त्र्यहं पयः॥१६६॥ एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः। अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ॥ १७० ॥ गुरुतल्पव्रतं कुर्याद्रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु । सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च ॥१७१॥ पैतृष्वस्रेयीं भगिनीं स्वस्त्रीयां मांतुरेव च । मातुश्च भ्रातुस्तनयां गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥१७२॥ एतास्तिस्रस्तु भार्यार्थे नोपयच्छेत्तु बुद्धिमान् । ज्ञातित्वेनानुपेयास्ताः पतति ह्युपयन्नधः ॥ १७३ ॥ कपास, रेशम, ऊन दो और एक खुर के पशु, पक्षी, सुगन्ध द्रव्य, औषध, रस्सी की चोरी करने पर तीन दिन पानी पीकर बितावे। द्विजों को इन व्रतों से चोरी के पाप को दूर करना चा- हिए। अगम्या स्त्री के गमन का पाप इन व्रतों से दूर करे:-सगी बहन, मित्र और पुत्र की स्त्री, कुमारी और चाण्डाली के साथ ग- मन में, गुरुपत्नी-गमन का प्रायश्चित्त करे। फूफूकी बेटी, मौसी की बेटी और मामा की बेटी इन तीन बहिनों से गमन करके चान्द्रायण व्रत करे। बुद्धिमान् पुरुष इन तीनों को स्त्रीरूप से स्वी- कार न करे। ये जाति की होने से अगम्या हैं इनसे गमन करने से नरकगामी होता है ॥ १६६-१७३ ॥