मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 572, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें४३२ मनुस्मृति । हुङ्कारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः । स्नात्वाऽनश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ॥ २०५ ॥ ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे वाबध्य वाससा । विवादे वा विनिर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत् ॥ २०६ ॥ अवगूर्य त्वब्दशतं सहस्रमभिहत्य च । जिघांसया ब्राह्मणस्य नरकं प्रतिपद्यते ॥ २०७ ॥ शोणितं यावतः पांशून् संगृह्णातिमहीतले । तावन्त्यब्द सहस्राणि तत्कर्ता नरके वसेत् ॥ २०८ ॥ एक मास तक दो दिन के बाद तीसरे दिन सायंकाल को भोजन, वेदसंहिता का पाठ और साकल मन्त्रों से होम, पंक्ति- बाह्य को शुद्ध करता है । ब्राह्मण जानकर ऊंट या गधे की सवारी में बैठे या नंगा होकर स्नान करे तो प्राणायाम से शुद्ध होता है । मल, मूत्र के वेग से आतुर पुरुष बिना जलके वा जल में मल-मूत्र करे तो गाँव के बाहर सचैल स्नान करे और गौ का स्पर्श करके शुद्ध होता है । वेदोक्त नित्यकर्मों का और स्नातक का व्रत का लोप होने पर उपवास करना प्रायश्चित्त है । ब्राह्मण को हुंकार (चुप रह आदि) और बड़े को (तू) कहकर स्नान करके भोजन करे और प्रणाम करके उनको प्रसन्न करे । ब्राह्मण को तिनुके से भी मारकर अथवा वस्त्र से बांधकर या विवाद से जीतकर प्रणाम करके उनको प्रसन्न करे । ब्राह्मण को मारने की इच्छा से दण्डा उठाकर सौ वर्ष और मारकर हज़ार वर्ष नरक में पड़ता है । मारेहुए ब्राह्मण के देह से गिरा रुधिर धूल के जितने कणों को भिगोता है मारनेवाला उतने हज़ार वर्ष नरक में पड़ता है ॥ २०५-२०८ ॥ अवगूर्य चरेत्कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने । कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम् ॥ २०६॥