मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] ५६ मनुस्मृति ।
[Main Text] किसी किसी निषिद्ध का विधान भी किया है । और वैदिक ' पशुसंज्ञपन ' पिष्टपशु साध्य है, यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि ' न वा उ एतन्म्रियसे-' इस उक्त श्रुति का विरोध होता है, तथा ' अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपायै मेदसोऽनुब्रूहि ' इत्यादि श्रुतियों का पैष्टिक पशु में अत्यन्त बाध है तथा पिष्टपशु करने का विधिवाक्य भी नहीं है जो ' श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणां व्रीहिमियः पशुः ' इत्यादि वाक्यों से विधि की कल्पना की जाती है वह ' पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते ' इसके समान उपेक्षणीय है । और जिस लक्ष्य से पिष्टपशु का विधित्व माना जाता है उससे भी छूटना असंभव है क्योंकि- ' व्युत्थानावस्थायां रागादीनां वशप्रवृत्तायाम् । म्रियतां जीवो मा वा धावतये ध्रुवं हिंसा ॥ ' तो अशास्त्रीयकर्म में अहंभाव से पड़कर क्या फल है ? धन, नहीं निधन....इत्यादि । अग्निपुराण की शिक्षा है कि- ' अग्निष्टोमादिकर्माणि सापायानि कलौयुगे । गङ्गास्नानं हरेर्नाम निरपायमिदं द्वयम् ॥ ' संस्कार-व्यय । जातीय संस्कार ( द्विजत्वघटक-संस्कार ) में अल्पव्यय है । यदि ऐसा न होता तो धनिक ही जातिमान् बन सकते; यह बात गृह्यस्मृतियों के देखने से साफ जाहिर है । पारस्कर गृह्यस्मृति के प्रधान व्याख्याता कर्काचार्य आव- सथ्याधान के ' ततो ब्राह्मणभोजनम् ' इस अन्तिम सूत्र की व्याख्या में सिद्धान्त करते हैं कि एक ब्राह्मण भोजन कराना । आशय यह है कि जहां प्रकृत के समान संख्या का ज्ञान न हो वहां एक ब्राह्मण लेना और जहां ' ब्राह्मणान् भोजयित्वा'
[Footnote] १ बृहन्नार में ।