भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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४५० मनुस्मृति । रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ॥ ४४ ॥ झल्ला मल्ला नटाश्चैव पुरुषाः शस्त्रवृत्तयः । द्यूतपानप्रसक्ताश्च जघन्या राजसी गतिः ॥ ४५ ॥ राजानः क्षत्रियाश्चैव राज्ञश्चैव पुरोहिताः । वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः ॥ ४६ ॥ इन गुणों में जिस गुण से जीव जिन जिन गतियों को पाता है, उन गतियों को संक्षेप से कहताहूं-सात्त्विक गुणवाले देव- भाव, रजोगुणी मनुष्यत्व और तमोगुणी पक्षीपनको पाते हैं- यह तीन प्रकार की गति है। सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों से होनेवाली गति, कर्म और विद्या के अनुसार, उत्तम-मध्यम-अ- धम होती है । वृक्षादि स्थावर, कृमि, कीट, मछली, साँप, क- छुवा, पशु और मृग, ये तमोगुणी अधम गति है। हाथी, घोड़ा, शूद्र, म्लेच्छ, सिंह, व्याघ्र और शूकर ये तमोगुणी मध्यमगति है। चारण-भाँट, गरुड़ादि पक्षी, पाखंडी पुरुष, राक्षस और पि- शाच ये तमोगुण की उत्तम गति जाननी चाहिए। झल्ल, मल्ल, नट, शस्त्र से जीनेवाले, जुआ-मद्यपान में आसक्त पुरुष ये रजो- गुण की अधमगति हैं । राजा, क्षत्रिय, राजपुरोहित, विवाद करनेवाले ये रजोगुणी मध्यमगति है ॥ ३६-४६ ॥ गन्धर्वा गुह्यका यक्षा विबुधानुचराश्च ये । तथैवाप्सरसः सर्वा राजसीषूत्तमा गतिः ॥ ४७ ॥ तापसा यतयो विप्रा ये च वैमानिका गणाः । नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ॥ ४८ ॥ यज्वान ऋषयो देवा वेदा ज्योतींषि वत्सराः । पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः ॥ ४६ ॥