मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ
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| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | : पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| ऋग्वेदन्नित्यशस्त्रिंश | ... २४१ | एक जातिर्द्विजातींस्तु | ... २४२ |
| ऋग्वेदो देवदैवत्यः | ... १३५ | एकदेशं तु वेदस्य | ... ४७ |
| ऋचो यजूंषि सामानि | ... ४४१ | एकमप्याशयेद्विप्रम् | ... ७६ |
| ऋणपस्ते तु सर्वं स्युः | ... ३१ | एकमेव तु शूद्रस्य | ... १७ |
| ऋणं दातुमशक्तो यः | ... २७२ | एकमेव दहत्यग्निः | ... ३०८ |
| ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य | ... १६५ | एकरात्रं तु निवसन् | ... ८२ |
| ऋणे देये प्रतिज्ञाते | ... २६६ | एकाकिनश्चात्यागिके | ... २३४ |
| ऋणे धने च सर्वस्मिन् | ... ३५४ | एकाकी चिंतयेन्नित्यम् | ... १५८ |
| ऋतमूञ्छशिलं ज्ञेयम् | ... ११४ | एकाक्षरं परं ब्रह्म | ... ३८ |
| ऋतानाञ्चाभ्यां जीवेत्तु | ... ११४ | एकादशं मनो ज्ञेयम् | ... ३६ |
| ऋतुःस्वाभाविकःस्त्रीणाम् | ... ७३ | एकादशेन्द्रियाण्याहुः | ... ३६ |
| ऋतुकालाभिगामी स्यात् | ... ७३ | एकाधिकं हरेज्ज्येष्ठः | ... ३३८ |
| ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैः | ... १४५ | एकान्तरे त्वानुलोम्यात् | ... ३७७ |
| ऋत्विग्यदि वृतो यज्ञे | ... २८१ | एकासिङ्गे गुदे तिस्रः | ... १८३ |
| ऋत्विजं वरणजैश्चान्यैः | ... ३११ | एकैकं ह्रासयेत्पिण्डम् | ... ४३४ |
| ऋषयः पितरो देवाः | ... ७६ | एकैकं ग्रासमश्रीयात् | ... ४३३ |
| ऋषयः संयतात्मानः | ... ४३७ | एकैकमपि विद्वांसम् | ... ८७ |
| ऋषयो दीर्घसंध्यात्वात् | ... १३० | एकोऽपि वेदविद्धर्मम् | ... ४२१ |
| ऋषिभिर्ब्राह्मणैश्चैव | ... १६४ | एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्यान् | ... २५८ |
| ऋषिभ्यः पितरो जाताः | ... ६६ | एषोऽहमस्मीत्यात्मानम् | ... २६१ |
| ऋषियज्ञं देवयज्ञम् | ... ११७ | एतच्च द्विविधं विद्यान् | ... २२३ |
| ए | एतच्छौचं गृहस्थानाम् | ... १८३ | |
| एक एव चरेन्नित्यम् | ... १६६ | एतन्न परे चक्षुः | ... ३३५ |
| एक एव सुहृद्धर्मः | ... २४८ | एतत्सर्वं हि पुरुषम् | ... १३७ |
| एक एवौरसः पुत्रः | ... ३४५ | एतद्दण्डविधिं कुर्यात् , | ... २८४ |
| एकः प्रजायते जन्तुः | ... १५५ | एतदक्षरमेतां च | ... ३७ |
| एकः शतं योधयति | ... २१६ | एतदन्तास्तु गतयः | ... ११ |
| एकः शयीत सर्वत्र | ... ५४ | एतदुक्तं द्विजातीनाम् | ... १६४ |
| एकं वृषभमुद्धारम् | ... ३३६ | एतदेव चरेत्कृच्छ्र | ... ४१६ |
| एकं कालं चरेद्भैक्षम् | ... १६६ | एतदेव व्रतं कुर्युः | ... ४१० |
| एकं गोमिथुनं द्वे वा | ... ७० | एतदेव ब्रा कृत्स्नम् | ... ४१६ |