मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ
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| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| खट्वाङ्गी चीरवासा वा | ... ४१५ | गृहं तडागमारामम् | ... २६१ |
| खराश्वोष्ट्रमृगेभानाम् | ... ४०६ | गृहस्थस्तु यदा पश्येत् | ... १६० |
| खलात्क्षेत्रादगाराद्वा | ... ४०० | गृहियाः पुत्रिणो मौलाः | ... २१६ |
| खं सन्निवेशयेत्खेषु | ... ४६४ | गृहीत्वा मुसलं राजा | ... ४१४ |
| ख्यापनेनानुतापेन | ... ४३५ | गृहे गुरावर ण्ये वा | ... १६७ |
| ग | गोत्ररिक्थे जनयितुः | ... ३४२ | |
| गत्वा कक्षान्तरं त्वन्यत् | ... २४५ | गोपः क्षीरभृतो यस्तु | ... २८५ |
| गन्धर्वा गुह्यका यक्षाः | ... ४५० | गोमूत्रमग्निवर्णं वा | ... ४१३ |
| गर्दभाजाविकानां तु | ... २६६ | गोमूत्रं गोमयं क्षीरम् | ... ४३३ |
| गर्भाष्टमेऽब्देकुर्वीत | ... २६ | गोरक्षकान्वाणिजिकान् | ... २६३ |
| गर्भिणी तु द्विमासादिः | ... ३१५ | गोवधोऽयान्य संयाज्ये | ... ४०७ |
| गवाचान्नमूपाघातम् | ... १५० | गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासाद | ... ५८ |
| गार्भैर्होमैर्जातकर्म | ... २८ | गोषु ब्राह्मणसंस्थासु | ... ३०८ |
| गिरिपृष्ठं समारुह्य | ... २३१ | गौडी पैष्टी च माध्वी च | ... ४१३ |
| गुच्छगुल्मं तु विविधम् | ... १० | ग्रहीता यदि नष्टः स्यात् | ... २७४ |
| गुणांश्च सूपशाकाद्यान् | ... १०३ | ग्रामघाते हिताभङ्गे | ... ३६३ |
| गुरुं वा बालवृद्धौ वा | ... ३०५ | ग्रामस्याधिपतिं कुर्यात् | ... २२६ |
| गुरुणानुमतः स्नात्वा | ... ६६ | ग्रामादाहृत्य वाश्नीयात् | ... १६४ |
| गुरुतल्पमभिभाष्यैनः | ... ४१५ | ग्रामदोषांन्सपुत्रघ्नान् | ... २२६ |
| गुरुतल्पव्रतं कुर्यात् | ... ४२६ | ग्रामीयरूक्कुलानां च | ... २८६ |
| गुरुतल्पे भगः कार्यः | ... ३५८ | ग्रामेष्वपि च ये केचित् | ... ३६३ |
| गुरुपत्नी तु युवतिः | ... ५६ | ग्रीष्मे पञ्चतपास्तु स्यात् | ... १६३ |
| गुरुवत्प्रतिपूज्याः स्युः | ... ५६ | घ | |
| गुरुषु त्वभ्यतीतेषु | ... १५७ | घृतकुम्भं वराहे तु | ... ४२० |
| गुरुन्भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन् | ... १५७ | घ्राणेन शूकरो हन्ति | ... १०५ |
| गुरोः कुले न भिक्षेत | ... ५४ | च | |
| गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु | ... १७१ | चक्रवृद्धिं समारूढः | ... २७३ |
| गुगेर्गुरौ संनिहिते | ... ५८ | चक्रिणो दशमीस्थस्य | ... ४७ |
| गुगेर्यत्र परीवादः | ... ५७ | चण्डालश्वपचानां तु | ... ३८४ |
| गुल्मान्वेणूंश्च विविधान् | ... २८८ | चण्डलात्पाण्डुसोपाकः | ... ३८१ |
| गुल्मांश्च स्थापयेद्दाशान् | ... २३६ | चण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा | ... ४२७ |