भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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६० मनुस्मृति । फिर बृहदारण्यक में 'महिमान एवैषां—' इस कथन से एकही देवता के अनेक रूप बतलाये हैं। इसी वैदिक दर्शन से भगवान् व्यास ने 'विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्ते- र्दर्शनात् १।३।२७' यह विग्रहसूचक सूत्र बनाया और पुराण इतिहासों में विष्णु, शिव, शक्ति आदि भिन्न भिन्न विग्रह तथा एकही विष्णु आदि के अनेक विग्रह कहे गये हैं। और महाभारत के प्रारम्भ में पुराण तथा इतिहास के द्वारा वैदिक ज्ञान को बढ़ाने को कहा— 'इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति ॥' आजान सिद्ध देवताओं की महिमा का तो कहना ही क्या है; पर कर्मसिद्ध योगियों की महिमा भी श्रुति स्मृति से विलक्षण ज्ञात होती है— 'पृथ्व्यप्तेजोनिलखे समुत्थे पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥' श्वेता० २।१२. 'आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ । योगी कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥


१ मन्त्रलिङ्गों से ज्ञात देवविग्रहादिकों का संग्राहक श्लोक— 'विग्रहो हविषां भोग ऐश्वर्यं च प्रसन्नता । फलप्रदानमित्येतत् पञ्चकं विग्रहादिकम् ॥' शारीरकव्याख्या.