मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ
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( १६ )
[स्तम्भ १]
| श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|
| जामयो यानि गेहानि | ७५ |
| जालान्तरगते भानौ | २६८ |
| जित्वा संपूजयेद्देवान् | २४१ |
| जिनकार्मुकवस्त्रावीन् | ४२१ |
| जीर्णोद्यानान्यरण्यानि | ३६२ |
| जीवन्तीनां तु तासां ये | २५० |
| जीवसंज्ञोऽन्तरात्मान्यः | ४४४ |
| जीवितात्ययमापन्नः | ३६२ |
| जीवेदेतेन राजन्यः | ३६१ |
| ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा | ७० |
| ज्ञातिसंबन्धिभिस्त्वेते | ३५८ |
| ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित् | ८७ |
| ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि | ८८ |
| ज्ञानं तपोऽग्निराहारः | १७८ |
| ज्ञानेनैवापरे विप्राः | ११० |
| ज्ञानोत्कृष्टाय देयानि | ८७ |
| ज्यायांसमनयोर्विद्यात् | ८८ |
| ज्येष्ठः एव तु गृह्णीयान् | ३३६ |
| ज्येष्ठः कुलं वर्धयति | ३३६ |
| ज्येष्ठता च निवर्तेत | ४२६ |
| ज्येष्ठस्तु जातो ज्येष्ठायाम् | ३३६ |
| ज्येष्ठश्चैव कनिष्ठश्च | ३३७ |
| ज्येष्ठस्य विंश उद्धारः | ३३७ |
| ज्येष्ठेन जातमात्रेण | ३३६ |
| ज्येष्ठो यवीयसो भार्याम् | ३२७ |
| ज्योतिषञ्च विकुर्वाणान् | १५ |
| झ | |
| झल्ला मल्ला नटाश्चैव | ४५० |
| झल्लो मल्लश्च राजन्यात् | ३७८ |
[स्तम्भ २]
| श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|
| ड | |
| डिम्भाहवहतानां च | १७६ |
| त | |
| तं यस्तु द्वेष्टि संमोहात् | २०८ |
| तं राजा प्रणयन्सम्यक् | २११ |
| तं हि स्वयम्भूः स्वादास्यान | १८ |
| त एव हि त्रयो लोकाः | ६२ |
| तं चेदम्युदियात्सूर्यः | ६० |
| तडागभेदकं हन्यात् | ३६४ |
| तडागान्युदपानानि | २८८ |
| ततः प्रभृतियो मोहान् | ३२६ |
| ततः स्वयम्भूर्भगवान् | २ |
| ततस्तथा स तेनोक्तः | १२ |
| ततो दुर्गं च राष्ट्रं च | २११ |
| ततो भुक्तवतां तेषाम् | १०७ |
| तत्राज्ञेन विनीतेन | ३२४ |
| तत्र भुक्त्वा पुनः किञ्चित् | २४५ |
| तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तम् | ४४७ |
| तत्र यद्ब्रह्मजन्मास्य | ५२ |
| तत्र ये भोजनीयाः स्युः | ८६ |
| तत्र स्थिनः प्रजाः सर्वाः | २३१ |
| तत्रात्मभूतैः कालज्ञैः | २४४ |
| तत्रापारावृतं धान्यम् | २८७ |
| तत्रासीनः स्थितो वापि | २४३ |
| तत्सम्पृष्ठो हि लोकस्य | ३०५ |
| तत्सहायैरनुगतैः | ३६२ |
| तस्यादायुधमेपन्नम् | २१६ |
| तथा त्रयाणां वर्णानां | ३७६ |
| तथा च क्षत्रयो ब्रह्यः | ३२१ |
| तथा धौरममेयानाम् | ३०० |
| तथा नित्यं यतेयाताम् | ३३५ |