मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ
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| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| न भोजनार्थे स्वे विप्रः | ८३ | नष्टं विनष्टं कृमिभिः | २८६ |
| न भ्रातरो न पितरः | ३४६ | न संवसेच्च पतितैः | १२७ |
| न मांसभक्षणे दोषः | १६६ | न संहताभ्यां पाणिभ्याम् | १२८ |
| न माता न पिता न स्त्री | ३११ | न संभाषां परस्त्रीभिः | ३०७ |
| न मित्रकारणाद्राजा | ३०४ | न ससत्त्वेषु गर्तेषु | १२२ |
| न मूलोञ्छं च मुन्दीयात् | १२६ | न साक्षी नृपतिः कार्यः | २५७ |
| न यज्ञार्थं धनं शूद्रात् | ४०१ | न सीदन्नपि धर्मेण | १४३ |
| नरके हि पतन्त्येते | ४०३ | न सीदेत्स्नातको विप्रः | १२० |
| न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात् | १२८ | न सुप्तं न विसन्नाहम् | २२२ |
| न राज्ञामघ दोषोऽस्ति | १७६ | न स्कन्दते न व्यथते | २२१ |
| नर्क्षवृक्षनदीनाम्नों | ६७ | न स्नानमाचरेद्भुक्त्वा | १३६ |
| न लङ्घयेद्वत्सतन्त्रीम् | १२० | न स्पृशेत्पाणिनोच्छिष्टः | १३८ |
| न लोकवृत्तं वर्तेत | ११६ | न स्वामिना निसृष्टोऽपि | ३१६ |
| न वर्धयेदघाहानि | १७४ | न हायनैर्न पलितैः | ४१ |
| न वारयेद्गां धयन्तीम् | १२४ | न हि दण्डादृते शक्यः | ३६२ |
| न वार्यपि प्रयच्छेत्तु | १४७ | न हीदृशमनायुष्यम् | १३७ |
| न विगर्ह्यां कथां कुर्यात् | १२६ | न हट्टेिन विना चौरम् | ३६३ |
| न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु | १७८ | नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां | १६८ |
| न विवादेन कलहेन | १३५ | नाक्षैः क्रीडेत्कदाचित्तु | १२६ |
| न विस्मयेन तपसा | १५५ | नाग्नि मुखेनोपधमेत् | १२३ |
| न वृथा शपथं कुर्यात् | २६५ | नाञ्जयन्तीं स्वकं नेत्रं | १२१ |
| न वेमानर्चिता ह्यस्य | ११६ | नाततायिवधे दोषः | ३०५ |
| न वै कन्या न युवतिः | ४०३ | नातिकल्यं नातिसायम् | १३८ |
| न वै तान्स्नातकान्विद्यात् | ३६८ | नातिसांवत्सरीं वृद्धिम् | २७२ |
| न वै स्वयं तदश्नीयात् | ८३ | नात्ता दुष्यत्यदन्नान्नान् | १६५ |
| न शङ्करान्ध्वे निवसेत् | १२४ | नात्मानमवमन्येत | १३७ |
| न शूद्राय मतिं दद्यात् | १२७ | नात्रिवर्षस्य कर्तव्या | १७२ |
| न शूद्रे पातकं किञ्चित् | ३६६ | नाददीत नृपः साधुः | ३५८ |
| नश्यतीशुर्यथा विद्धः | ३२५ | नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नम् | १५३ |
| नश्यान्त इत्यृक्त्वानि | ८१ | नाद्यादार्द्राणि मांसम् | १६५ |
| न श्राद्ध भोजयान्मित्रान् | ८८ | नाधर्मश्चरितो लोके | १४३ |