भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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७६ मनुस्मृति ।

आशङ्का करते हैं वे 'अतिप्रमाणान्येतानि—' इत्यादि पूर्वोक्त वाक्यों से समाधेय हैं । और जो भावजन्य दोष तन्त्र के कतिपय अंश में हैं वे समस्त किंवा व्यस्तरूप से वेद में भी उपलब्ध हैं । इस कारण दोनों की एक गति है । महाभारत के अनुक्रमणिका अध्याय में लिखा है कि— ' तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्क- स्तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥ ' और जो तन्त्र के अंश प्रत्यक्ष श्रुति-विरुद्ध हैं वे विरोधा- धिकरणन्याय से जबतक मूल श्रुति का लाभ न हो तबतक आचरण के योग्य नहीं हैं । और जो— “ वामं पाशुपतं सोमं लाङ्गलं चैव भैरवम् । न सेव्यमेतत्कथितं वेदवाह्यं तथेतरत् ॥ कापालं पञ्चरात्रं च यामलं वाममर्हतम् । एवंविधानि चान्यानि मोहनार्थानि तानि तु ॥ ” इत्यादि पाशुपत विशेष, पञ्चरात्र विशेष तथा अन्यान्य जो सर्वांश से वेदविरुद्ध हैं वे महापातक-दूषित-वेद-भ्रष्ट तथा अन्यान्य जाति के लिये कहे हैं यह सब बात ईन वाक्यों से स्पष्ट है—


१ 'ततस्तु सप्तमे- ' मनु० १२ । २५ । २-३ पाशुपत तथा पञ्चरात्र के द्वैविध्यते 'विशेष' पद का दान किया है । ४ यहां कतिपयवचन विद्वद्वर श्रीमल्लछेदरामप्रणीत सनातनधर्मोद्धार से लिखे हैं ।