भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 8

६ मनुस्मृति । की रचना के अनुरोध से हुआ और चौथे अथर्व-वेद का नाम अध्ययन के कारण से हुआ । आशय यह है कि जहांपर छन्दके वश पाद की व्यवस्था की जाय वह ऋक्; जहां गान के अनु- कूल व्यवस्था हो वह साम; और जहां छन्द तथा गानसे अतिरिक्त गद्यभाग हो वह यजु कहलाता है । यह ऋक्, साम तथा यजु का लक्षण जैमिनि-मुनि ने कहाहै— 'ऋग्यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था । गीतिषु सामाख्या । शेषे यजुः शब्दः ।' और इसी कारण से उक्त तीन वेद ऋग्वेद आदि के नाम से कहे जाते हैं । और ब्रह्मा जीने जिन मन्त्र-ब्राह्मणों को अपने पुत्र अथर्वा नामक ऋषि को पढ़ाया उनका संग्रह अथर्ववेद नाम से प्रसिद्ध हुआ । यह बात मुण्डकोपनिषद् में कही है । ' ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा - मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ ' उक्त चारों वेदोंके मन्त्रभाग, जो संहिता वा मन्त्रसंहिता नाम से प्रसिद्ध हैं; उनमें और उनके ब्राह्मणभाग में जो ज्ञानकाण्ड है वह उपनिषद् कहलाता है । सुप्रसिद्ध चारों वेदों की मन्त्रसंहिताओं में से केवल यजुर्वेदही की मन्त्रसंहिता का अन्तिम चालीसवां अध्याय ईशावास्यनामक उपनिषद् है, बाकी उपनिषद् ब्राह्मणभाग के अन्तर्गत हैं । और वेद का कोई भाग विशेष आरण्यक नाम से कहाजाता है । वह अरण्य १ ऋक्संहिता, यजुःसंहिता, सामसंहिता और अथर्वसंहिता ।