संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- त्याज्य-ग्राह्य, द्रव्यशुद्धि, अशौच-निर्णय तथा कर्त्तव्याकर्त्तव्यका वर्णन * ६०१
होती है। इसी प्रकार रूईके बने कपड़े पानी और क्षारसे शुद्ध होते हैं। मिट्टीके बर्तन दोबारा पकानेसे शुद्ध होते हैं। भिक्षामें प्राप्त अन्न, कारीगरका हाथ, बाजारमें बिकनेके लिये आयी हुई शाक आदि वस्तुएँ, स्त्रियोंका मुख, गलीमें आयी हुई वस्तु, जिसके गुण-दोषका ज्ञान न हो—ऐसी वस्तु और सेवकोंकी लायी हुई चीज सदा शुद्ध मानी गयी है। जिसके शिशुने अभी दूध पीना नहीं छोड़ा हो, ऐसी स्त्री तथा दुर्गन्ध और बुद्बुदोंसे रहित बहता हुआ जल स्वाभाविक शुद्ध है। समयानुसार अग्निसे तपाने, बुहारने, गायोंके चलने-फिरने, लीपने, जोतने और सींचनेसे भूमिकी शुद्धि होती है। बुहारनेसे और देवताओंकी पूजा करनेसे घर शुद्ध होता है। जिस पात्रमें बाल या कीड़े पड़े हों, जिसे गायने सूंघ लिया हो तथा जिसमें मक्खियाँ पड़ी हों, उसकी शुद्धि राख और मिट्टीसे मलकर जलद्वारा धोनेसे होती है। ताँबेका बर्तन खटाईसे, राँगा और सीसा राखसे और काँसेके बर्तनोंकी शुद्धि राख और जलसे होती है। जिस पात्रमें कोई अपवित्र वस्तु पड़ गयी हो, उसे मिट्टी और जलसे तबतक धोये, जबतक कि उसकी दुर्गन्ध दूर न हो जाय। इससे वह शुद्ध होता है। पृथ्वीपर प्राकृतिक रूपसे वर्तमान जल, जिससे एक गायकी प्यास बुझ सके, शुद्ध माना गया है। गलीमें पड़ा हुआ वस्त्र वायुके लगनेसे शुद्ध होता है। धूल, अग्नि, घोड़ा, गाय, छाया, किरणें, वायु, जलके छींटे और मक्खी आदि—ये सब अशुद्ध वस्तुके संसर्गमें आनेपर भी शुद्ध ही रहते हैं। बकरे और घोड़ेका मुख शुद्ध माना गया है; किन्तु गायका नहीं। बछड़ेका मुख तथा माताका स्तन भी पवित्र बताया गया है। फल गिरानेमें पक्षीकी चोंच भी शुद्ध मानी गयी है। आसन, शय्या, सवारी, नाव और मार्गके तृण—ये सब बाजारमें बिकनेवाली वस्तुओंकी तरह सूर्य और चन्द्रमाकी किरणों तथा वायुके स्पर्शसे शुद्ध होते हैं। गलियोंमें घूमने-फिरने, स्नान करने, छींक आने, पानी पीने, भोजन करने तथा वस्त्र बदलनेपर विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये। अस्पृश्य वस्तुओंसे जिनका स्पर्श हो गया हो उनकी, रास्तेके कीचड़ और जलकी तथा ईंटकी बनी हुई वस्तुओंकी वायुके संसर्गसे शुद्धि होती है।
अनजानेमें यदि दूषित अन्न भोजन कर ले तो तीन रात उपवास करे और यदि जान-बूझकर किया हो तो उसके दोषकी शान्तिके लिये प्रायश्चित्त करे। मनुष्यकी गीली हड्डीका स्पर्श करके स्नान करनेसे शुद्धि होती है और सूखी हड्डीका स्पर्श कर लेनेपर केवल आचमन करके गायका स्पर्श या सूर्यका दर्शन करनेसे मनुष्य शुद्ध हो सकता है। बुद्धिमान् पुरुष रक्त, खँखार तथा उबटनको न लाँघे और असमर्थमें उद्यान आदिके भीतर कदापि न ठहरे। लोकनिन्दित विधवा स्त्रीसे वार्तालाप न करे। जूठन, मल-मूत्र और पैरोंके धोवनको घरसे बाहर फेंके। दूसरेके खुदाये हुए पोखरे आदिके जलमें पाँच लोंदा मिट्टी निकाले बिना स्नान न करे। देवसम्बन्धी सरोवरों तथा गङ्गा आदि नदियोंमें सदा ही स्नान करे। देवता, पितर, उत्तम शास्त्र, यज्ञ और मन्त्र आदिकी निन्दा करनेवाले पुरुषोंसे स्पर्श और वार्तालाप करनेपर सूर्यके दर्शनसे शुद्धि होती है। रजस्वला स्त्री, अन्त्यज, पतित, सूतक, विधर्मी, प्रसूता स्त्री, नपुंसक, वस्त्रहीन, चाण्डाल, मुर्दा ढोनेवाले तथा परस्त्रीगामी पुरुषोंको देखकर विद्वान् पुरुषोंको इसी प्रकार सूर्यके दर्शनसे आत्मशुद्धि करनी चाहिये। अभक्ष्य पदार्थ, नवप्रसूता स्त्री, नपुंसक, बिलाव, चूहा, कुत्ता, मुर्गा, पतित, जाति-बहिष्कृत, चाण्डाल, मुर्दा ढोनेवाले, रजस्वला स्त्री, ग्रामीण सूअर तथा अशौचदूषित मनुष्योंको छू लेनेपर स्नान करनेसे शुद्धि होती है। जिसके घरमें प्रतिदिन नित्यकर्मकी अवहेलना होती हो तथा जिसे ब्राह्मणोंने त्याग दिया हो, वह नराधम