भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 107
  • सुबाहुकी प्रेरणासे काशिराजका अलर्कपर आक्रमण, अलर्कका दत्तात्रेयजीसे योगका उपदेश लेना * १०७

धातुओंको आगमें तपानेसे उनके दोष जल जाते हैं, उसी प्रकार प्राणायाम करनेसे इन्द्रियजनित दोष दूर हो जाते हैं। अतः योगके ज्ञाता पुरुषको पहले प्राणायामका ही साधन करना चाहिये। प्राण और अपानवायुको रोकनेका नाम ही प्राणायाम है। यह लघु, मध्य और उत्तरीयके भेदसे तीन प्रकारका बताया गया है। अलर्क! अब मैं उसकी मात्रा बतलाता हूँ, सुनो। लघु प्राणायाम बारह मात्राका होता है। इससे दूनी मात्राका मध्यम और तिगुनी मात्राका उत्तरीय अथवा उत्तम बताया गया है। पलकोंको उठाने और गिरानेमें जितना समय लगता है, वही प्राणायामकी संख्याके लिये मात्रा कहा गया है। ऐसी ही बारह मात्राओंका लघुनामक प्राणायाम होता है। प्रथम प्राणायामके द्वारा स्वेद (पसीने) को, मध्यमके द्वारा कम्पको और तृतीय प्राणायामके द्वारा विषादको जीते। इस प्रकार क्रमशः इन तीनों दोषोंपर विजय प्राप्त करे। जैसे सिंह, व्याघ्र और हाथी सेवाके द्वारा कोमल हो जाते हैं, उनकी कठोरता दब जाती है, उसी प्रकार प्राणायाम करनेसे प्राण योगीके वशमें हो जाता है। जैसे हाथीवान मत्तवाले हाथीको भी वशमें करके उसे इच्छानुसार चलाता है, उसी प्रकार योगी वशमें किये हुए प्राणको अपनी इच्छाके अधीन रखता है। जैसे वशमें किया हुआ सिंह केवल मृगोंको ही मारता है, मनुष्योंको नहीं, उसी प्रकार प्राणायामके द्वारा वशमें किया हुआ प्राण केवल पापोंका नाश करता है, मनुष्यके शरीरका नहीं। इसलिये योगी पुरुषको सदा प्राणायाममें संलग्न रहना चाहिये।

राजन्! ध्वस्ति, प्राप्ति, संवित् और प्रसाद—ये मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाली प्राणायामकी चार अवस्थाएँ हैं। अब क्रमशः इनके स्वरूपका वर्णन सुनो। जिस अवस्थामें शुभ और अशुभ सभी कर्मोंका फल क्षीण हो जाय और जिनकी वासना नष्ट हो जाय, उसका नाम 'ध्वस्ति' है। जब योगी इस लोक और परलोकके भोगोंके प्रति लोभ और मोह उत्पन्न करनेवाली समस्त कामनाओंको रोककर सदा अपने-आपमें ही संतुष्ट रहता है, वह निरन्तर रहनेवाली 'प्राप्ति' नामक अवस्था है। जिस समय योगी सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रहोंके समान प्रभावशाली होकर उत्तम ज्ञान-सम्पत्ति प्राप्त करता है और उस ज्ञान-सम्पत्तिसे भूत-भविष्यकी बातोंको तथा दूर स्थित एवं अदृश्य वस्तुओंको भी जान लेता है, उस समय प्राणायामकी 'संवित्' नामक अवस्था होती है। जिस प्राणायामसे मन, पाँच प्राणवायु, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय प्रसादको प्राप्त होते हैं, वह उसकी 'प्रसाद' अवस्था है।

राजन्! अब प्राणायामका लक्षण तथा योगाभ्यासमें निरन्तर प्रवृत्त रहनेवाले योगीके लिये विहित आसन बतलाता हूँ, सुनो। पद्मासन, अर्धासन, स्वस्तिकासन आदि आसनोंसे बैठकर मन ही मन प्रणवका चिन्तन करते हुए योगाभ्यास करे। शरीरको समभावसे रखे, आसन भी सम हो। दोनों पैरोंको समेटकर दोनों जाँघोंको आगेकी ओर स्थिर करे। मुँहको बंद किये रहे। एड़ियोंको इस प्रकार रखे, जिससे वे लिङ्ग और अण्डकोषका स्पर्श न कर सकें। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए स्थिर रहे। मस्तकको कुछ ऊँच किये रहे। दाँतोंका दाँतोंसे स्पर्श न होने दे। अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए अन्य दिशाओंकी ओर न देखे। रजोगुणसे तमोगुणको और सत्त्वगुणसे रजोगुणकी वृत्तिको भलीभाँति आच्छादित करके निर्मल सत्त्वमें स्थित हो योगवेत्ता पुरुष योगका अभ्यास करे। इन्द्रिय, प्राण आदि और मनको उनके विषयोंसे हटाकर प्रत्याहार आरम्भ करे। जैसे कछुआ अपने सब अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार जो समस्त कामनाओंको संकुचित कर लेता है, वह निरन्तर आत्मामें ही रमण करनेवाला और एकमात्र परमात्मामें स्थित