भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 109
  • योगके विघ्न, उनसे बचनेके उपाय, सात धारणा, आठ ऐश्वर्य तथा योगीकी मुक्ति * १०९

रहा है। तात्पर्य यह कि जिस-जिस अङ्गमें रोग पैदा हो, वहाँ-वहाँ उसमें लाभ पहुँचानेवाली धारणा करे। गर्मीमें सर्दीकी और सर्दीमें गर्मीकी धारणा करे। धारणाके द्वारा ही अपने मस्तकपर काष्ठकी कील रखकर दूसरे काष्ठके द्वारा उसे ठोंकनेकी भावना करे। इससे योगीकी लुप्त हुई स्मरणशक्तिका तत्काल ही आविर्भाव हो जाता है। इसके सिवा सर्वत्र व्यापक द्युलोक, पृथ्वी, वायु और अग्निकी भी धारणा करे। इससे अमानवीय शक्तियों तथा जीव-जन्तुओंसे होनेवाली बाधाओंकी चिकित्सा होती है। यदि कोई मानवेतर जीव योगीके भीतर प्रवेश कर जाय तो वह वायु और अग्निकी धारणा करके उसे अपने शरीरके भीतर ही जला डाले। राजन्! इस प्रकार योगवेत्ता पुरुषको सब प्रकारसे अपनी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि यह शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका साधक है।

योग-प्रवृत्तिके लक्षणोंको बतलाने तथा उनपर गर्व करनेसे योगीका विज्ञान लुप्त हो जाता है; इसलिये उन प्रवृत्तियोंको गुप्त ही रखना चाहिये। चञ्चलताका न होना, नीरोग रहना, निष्ठुरता न धारण करना, उत्तम सुगन्धका आना, मल-मूत्र कम होना, शरीरमें कान्ति, मनमें प्रसन्नता और वाणीके स्वरमें कोमलताका उदय होना—ये सब योगप्रवृत्तिके प्रारम्भिक चिह्न हैं। यदि योगीको देखकर लोगोंके मनमें अनुराग हो, परोक्षमें सब लोग उसके गुणोंका बखान करने लगें और कोई भी जीव-जन्तु उससे भयभीत न हो तो वह योगमें सिद्धि प्राप्त होनेकी उत्तम पहचान है। जिसे अत्यन्त भयानक सर्दी-गर्मी आदिसे कोई कष्ट नहीं होता तथा जो दूसरोंसे भयभीत नहीं होता, सिद्धि उसके निकट खड़ी है।


योगके विघ्न, उनसे बचनेके उपाय, सात धारणा, आठ ऐश्वर्य तथा योगीकी मुक्ति

दत्तात्रेयजी कहते हैं—आत्मसाक्षात्कारके समय योगी पुरुषके समक्ष जो विघ्न उपस्थित होते हैं, उनका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ; सुनो। उस समय वह सकाम कर्म करना चाहता है और मानवीय भोगोंकी अभिलाषा करता है। दानके उत्तमोत्तम फल, स्त्री, विद्या, माया, सोना-चाँदी आदि धन, याने आदिके अतिरिक्त वैभव, स्वर्गलोक, देवत्व, इन्द्रत्व, रसायनसंग्रह, उसे बनानेकी क्रियाएँ, हवामें उड़नेकी शक्ति, यज्ञ, जल और अग्निमें प्रवेश करना, श्राद्धों तथा समस्त दानोंका फल तथा नियम, व्रत, इष्ट, पूर्त एवं देव-पूजा आदिसे मिलनेवाले फलोंकी इच्छा करता है। जब चित्तकी ऐसी अवस्था हो तो योगी उसे कामनाओंकी ओरसे हटाये और परब्रह्मके चिन्तनमें लगाये। ऐसा करनेपर उसे विघ्नोंसे छुटकारा मिल जाता है।

इन विघ्नोंपर विजय पा लेनेके बाद योगीके सामने फिर दूसरे-दूसरे सात्त्विक, राजस और तामस विघ्न उपस्थित होते हैं। प्रतिभा, श्रावण, दैव, भ्रम और आवर्त—ये पाँच उपसर्ग योगियोंके योगमें विघ्न डालनेके लिये प्रकट होते हैं। इनका परिणाम बड़ा कटु होता है। जब सम्पूर्ण वेदोंके अर्थ, काव्य और शास्त्रोंके अर्थ, सम्पूर्ण विद्याएँ और शिल्पकला आदि अपने-आप योगीकी समझमें आ जायें तो प्रतिभासे सम्बन्ध रखनेके कारण वह 'प्रतिभ' उपसर्ग कहलाता है। जब योगी सहस्रों योजन दूरसे भी सम्पूर्ण शब्दोंको सुनने और उनके अभिप्रायको समझने लगता है, तब वह श्रवण-शक्तिसे सम्बन्ध रखनेके कारण 'श्रावण'