भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 113
  • योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * ११३

दत्तात्रेयजी कहते हैं—जो योगी इस प्रकार भलीभाँति योगचर्यामें स्थित होते हैं, उन्हें सैकड़ों जन्मोंमें भी अपने पथसे विचलित नहीं किया जा सकता। जिनके सब ओर चरण, मस्तक और कण्ठ हैं, जो इस विश्वके स्वामी तथा विश्वको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन विश्वरूपी परमात्माका प्रत्यक्ष दर्शन करके उनकी प्राप्तिके लिये परम पुण्यमय 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रका जप करे; उसीका अध्ययन करे। अब उसके स्वरूपका वर्णन सुनो। अकार, उकार और मकार—ये जो तीन अक्षर हैं, ये ही तीन मात्राएँ हैं। ये क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस हैं। इनके सिवा एक अर्द्धमात्रा भी है जो अनुस्वार या बिन्दुके रूपमें इन सबके ऊपर स्थित है। वह अर्द्धमात्रा निर्गुण है। योगी पुरुषोंको ही उसका ज्ञान हो पाता है। उसका उच्चारण गान्धार स्वरसे होता है, इसलिये उसे 'गान्धारी' भी कहते हैं। उसका स्पर्श चींटीकी गतिके समान होता है। प्रयोग करनेपर वह मस्तक-स्थानमें दृष्टिगोचर होती है। जैसे ॐकार उच्चारण किया जानेपर मस्तकके प्रति गमन करता है, उसी प्रकार ॐकारमय योगी अक्षरब्रह्ममें मिलकर अक्षररूप हो जाता है। प्रणव (ॐकार) धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म वेधनेयोग्य उत्तम लक्ष्य है। उस लक्ष्यको सावधानीके साथ वेधना चाहिये और बाणकी ही भाँति लक्ष्यमें प्रवेश करके तन्मय हो जाना चाहिये। यह ॐकार ही तीनों वेद, तीनों लोक, तीनों अग्नि, ब्रह्मा विष्णु तथा महादेव एवं ऋक्-साम और यजुर्वेद है। इस ॐकारमें वस्तुतः साढ़े तीन मात्राएँ जाननी चाहिये। उनके चिन्तनमें लगा हुआ योगी उन्हींमें लयको प्राप्त होता है। अकार भूर्लोक, उकार भुवर्लोक और व्यञ्जनरूप मकार स्वर्लोक कहलाता है। पहली मात्रा व्यक्त, दूसरी अव्यक्त, तीसरी चिच्छक्ति तथा चौथी अर्द्धमात्रा परमपद कहलाती है। इसी क्रमसे इन मात्राओंको योगकी भूमि समझना चाहिये। ॐकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण सत् और असत्‌का ग्रहण हो जाता है। पहली मात्रा ह्रस्व, दूसरी दीर्घ और तीसरी प्लुत है, किन्तु अर्द्धमात्रा वाणीका विषय नहीं है। इस प्रकार यह ॐकार नामक अक्षर परब्रह्मस्वरूप है। जो मनुष्य इसे भलीभाँति जानता अथवा इसका ध्यान करता है, वह संसार-चक्रका त्याग करके त्रिविध बन्धनोंसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्मामें लीन हो जाता है।* जिसका


* तन्प्राप्तये महत् पुण्यामोमित्येकाक्षरं जपेत्। तदेवाध्ययनं तस्य स्वरूपं शृण्वतः परम्॥
अकारश्च तथोकारो मकारश्चाक्षरत्रयम्। एता एव त्रयो मात्राः सात्त्वराजसतामसाः॥
निर्गुणा योगिगम्यान्त्या चार्द्धमात्रोर्ध्वसंस्थिता।
गान्धारीति च विज्ञेया गान्धारस्वरसंश्रया। पिपीलिकागतिस्पर्शा प्रयुक्ता मूर्ध्नि लक्ष्यते॥
यथा प्रयुक्त ओङ्कारः प्रतियातीति मूर्द्धनि। तथोङ्कारमयी योगी त्वक्षरे त्वक्षरो भवेत्॥
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुत्तमम्। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥
ओमितिह्येतत् त्रयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयोऽग्नयः। विष्णुर्ब्रह्मा हरश्चैव ऋक्सामानि यजूंषि च॥
मात्राः सार्द्धाश्च तिस्रश्च विज्ञेयाः परमार्थतः। तत्र युक्तस्तु यो योगी स तल्लयमवाप्नुयात्॥
अकारस्त्वथ भूर्लोक उकारश्चोच्यते भुवः। सव्यञ्जने मकारश्च स्वर्लोकः परिकल्प्यते।
व्यक्ता तु प्रथमा मात्रा द्वितीयाव्यक्तसंज्ञिता। मात्रा तृतीया चिच्छक्तिरर्द्धमात्रा परं पदम्॥
अनेनैव क्रमेणैता विज्ञेया योगभूमयः। ओमित्युच्चारणात् सर्वं गृहीतं सदसद्द्वयम्॥
ह्रस्वा तु प्रथमा मात्रा द्वितीया दीर्घसंयुक्ता। तृतीया च प्लुता ज्ञेया वचसः सा न गोचरा॥
इत्येतदक्षरं ब्रह्म परमोङ्कारसंज्ञितम्। यस्तु वेद नरः सम्यक् तथा ध्यायति वा पुनः॥
संसारचक्रमुत्सृज्य त्यक्तत्रिविधबन्धनः। प्राप्नोति ब्रह्मणि लयं परमे परमात्मनि॥
(४२ ३—१५)