भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

वर्ष-गणनाके अनुसार मन्वन्तरका मान सुनो। पूरे तीस करोड़ सरसठ लाख और बीस हजार वर्षोंका एक मन्वन्तर माना गया है। देवताओंके वर्षसे एक मन्वन्तरमें आठ लाख, बावन हजार वर्ष होते हैं। इस कालका चौदह गुणा करनेपर ब्रह्माका एक दिन होता है। इसके अन्तमें विद्वानोंने नैमित्तिक प्रलयका होना बतलाया है। उसमें भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक जलकर नष्ट हो जाते हैं। महर्लोक बच जाता है; किन्तु नीचेके लोकोंके जलनेसे वहाँ इतना ताप पहुँचता है कि उस लोकके निवासी जनलोकमें चले जाते हैं। फिर तीनों लोक एक महासमुद्रके गर्भमें छिप जाते हैं। ब्रह्माकी रात आ जाती है, इसलिये वे उसमें शयन करते हैं। ब्रह्माके दिनके बराबर ही उनकी रात भी होती है। उनके बीतनेपर फिर सृष्टिका क्रम चालू होता है। इस प्रकार क्रमशः ब्रह्माका एक वर्ष बीतता है और पूरे सौ वर्षतक उनका जीवन रहता है। उनके सौ वर्षको एक 'पर' कहते हैं। उसमेंसे पचास वर्षोंकी 'परार्द्ध' संज्ञा है। इस तरह ब्रह्माका एक परार्द्ध बीत चुका है। उसके अन्तमें पाद्म नामसे विख्यात महाकल्प हुआ था। ब्रह्मन्! अब उनका दूसरा परार्द्ध चल रहा है। इसमें यह वाराह कल्प प्रथम कल्प है।

**क्रौष्टुकि बोले—**सृष्टिके आदिकर्ता तथा प्रजापतियोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार प्रजाको उत्पन्न किया, उसका मेरे लिये विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

**मार्कण्डेयजीने कहा—**ब्रह्मन्! पाद्म कल्पके अन्तमें जो प्रलय हुआ था, उसके बाद रात्रि बीतनेपर जब सत्त्वगुणके उत्कर्षसे युक्त श्रीविष्णुरूप ब्रह्माजी सोकर उठे, उस समय उन्होंने संसारको शून्य देखा। जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले ब्रह्मस्वरूप भगवान् नारायणके विषयमें विद्वान् पुरुष यह श्लोक कहा करते हैं—

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः॥

'जल नरसे प्रकट हुआ है, इसलिये वह नार कहलाता है। भगवान् उसमें सोते हैं—भगवान्का वह अयन है, इसलिये वे नारायण कहे गये हैं।'

जागनेके बाद उन्होंने पृथ्वीको जलके भीतर डूबी हुई जानकर उसे निकालनेकी इच्छासे वाराहरूप धारण किया। उनका वह स्वरूप वेदमय, यज्ञमय एवं दिव्य था। उन सर्वव्यापी भगवान्ने वाराहरूपसे ही जलमें प्रवेश किया और पातालसे पृथ्वीको निकालकर जलके ऊपर रखा। उस समय जनलोकनिवासी सिद्धगण उन जगदीश्वरका चिन्तन एवं स्तवन कर रहे थे। पृथ्वी उस जल-राशिके ऊपर बहुत बड़ी नौकाकी भाँति स्थित हुई। पृथ्वीका आकार बहुत विशाल और विस्तृत है, इसलिये यह जलमें डूब नहीं पाती। तदनन्तर पृथ्वीको बराबर करके भगवान्ने उसपर पर्वतोंकी सृष्टि की। पूर्वकल्पकी सृष्टि जब प्रलयाग्निसे दग्ध होने लगी थी, उस समय सब पर्वत पृथ्वीपर खण्ड-खण्ड होकर बिखर गये और एकार्णवके जलमें डूब गये। फिर वायुके द्वारा वहाँ बहुत-सा जल एकत्रित हुआ। उस जलसे भीगकर और प्रवाहमें बहकर जो पर्वत जहाँ लग गये, वे वहाँ अचलरूपसे स्थित हो गये।

**क्रौष्टुकिने कहा—**ब्रह्मन्! आपने थोड़ेमें ही सृष्टिका भलीभाँति वर्णन किया, अब मुझे देवता आदिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त विस्तारके साथ बतलाइये।

**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्मन्! ब्रह्माजीने जब सृष्टि रचनेका विचार किया, तब पहले उनसे मानस पुत्र ही उत्पन्न हुए। तदनन्तर देवता, असुर, पितर और मनुष्य—इन चारोंको उत्पन्न