संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- स्वायम्भुव मनुकी वंश-परम्परा तथा अलक्ष्मी-पुत्र दुःसहके स्थान आदिका वर्णन * १२९
कीं; उनके नाम ये हैं, सुनो—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि तथा तेरहवीं कीर्ति। इन सबको धर्मने अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण किया। इनसे शेष जो ग्यारह छोटी कन्याएँ थीं, उनके नाम इस प्रकार हैं—ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, ऊर्जा, अनसूया, स्वाहा और स्वधा। इन सबको क्रमशः भृगु, महादेवजी, मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अत्रि, अग्नि और पितरोंने ग्रहण किया। श्रद्धाने कामको, लक्ष्मीने दर्पको, धृतिने नियमको, तुष्टिने संतोष और पुष्टिने लोभको उत्पन्न किया। मेधासे श्रुतका, क्रियासे दण्ड, नय और विनयका, बुद्धिसे बोधका, लज्जासे विनयका, वपुसे व्यवसायका, शान्तिसे क्षेमका, सिद्धिसे सुखका और कीर्तिसे यशका जन्म हुआ। ये सभी धर्मके पुत्र हैं।
कामसे उसकी पत्नी रतिने हर्ष नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो धर्मका पौत्र कहलाया। अधर्मकी स्त्री हिंसा थी। उसके गर्भसे अनृत नामक पुत्र और निरृति नामवाली कन्या उत्पन्न हुई। फिर इन दोनोंसे दो पुत्रों तथा दो कन्याओंका जन्म हुआ। पुत्रोंके नाम थे नरक और भय तथा कन्याओंके नाम थे माया और वेदना। वे उनकी पत्नयाँ हुईं। इनमें भयकी स्त्री मायाने सब प्राणियोंका संहार करनेवाले 'मृत्यु' नामक पुत्रको उत्पन्न किया और वेदनाने नरकके संसर्गसे दुःख नामक पुत्रको जन्म दिया। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध उत्पन्न हुए। ये सब अधर्मरूप हैं और दुःखके हेतु बतलाये जाते हैं। इनके स्त्री और पुत्र नहीं हैं। ये सभी ऊर्ध्वरेता हैं।
अलक्ष्मीके चौदह पुत्र हैं, जिनमें तेरह तो क्रमशः दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहङ्कारमें पृथक्-पृथक् रहते हैं। चौदहवेंका नाम दुःसह है, वह मनुष्योंके गृहोंमें निवास करता है। वह भूखसे दुर्बल, नीचा मुख किये, नंग-धड़ंग और चिथड़ा लपेटे रहता है; उसकी आवाज कौएके समान है। जब ब्रह्माजीने उसे उत्पन्न किया, तब वह सबको खा जानेके लिये उद्यत हुआ। वह तमोगुणका भंडार था और बड़ी-बड़ी दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल जान पड़ता था। उसका मुँह फैला हुआ था, इससे वह और भी भयंकर जान पड़ता था। उसको आहारके लिये उत्सुक देख लोकपितामह ब्रह्माजीने कहा—'दुःसह ! तुझे इस संसारका भक्षण नहीं करना चाहिये। तू अपना क्रोध शान्त कर। रजोगुणकी कला त्याग और इस तामसी वृत्तिको भी छोड़ दे।'
दुःसहने कहा—जगदीश्वर ! मैं भूखसे दुर्बल हो रहा हूँ और प्यास भी मुझे जोरसे सता रही है। नाथ ! बताइये—मुझे कैसे तृप्ति हो, मैं किस तरह बलवान् बनूँ? तथा मेरा निवास-स्थान कौन है, जहाँ मैं सुखसे रह सकूँ?
ब्रह्माजीने कहा—बेटा ! मनुष्योंका घर तुम्हारा निवास-स्थान है, अधर्मपरायण पुरुष तुम्हारे बल हैं तथा नित्यकर्मके त्यागसे ही तुम्हारी पुष्टि होगी। मर्म-व्रण और फोड़े तुम्हारे वस्त्र होंगे। अब तुम्हारे लिये आहारकी व्यवस्था करता हूँ। जिसमें किसी प्रकारकी क्षति पहुँची हो, कीड़े पड़ गये हों, कुत्तेने दृष्टि डाली हो, जो फूटे बर्तनमें रखा हो, जिसे मुँहसे फूँक-फूँककर ठंडा किया गया हो, जो जूठा और अपक्व हो, जिसमेंसे पानी छूटता हो, जिसको किसीने चख लिया हो, जो शुद्धतापूर्वक तैयार न किया गया हो, जिसे फटे आसनोंपर बैठकर भोजन किया गया हो, जो अपने समीपवर्तीको नहीं दिया गया हो, विपरीत दिशा अथवा कोणकी ओर मुँह करके खाया गया हो, दोनों सन्ध्याओंके समय और नाच, बाजा एवं स्वर-तालके साथ जिसको खाया गया हो, जिसे रजस्वला स्त्रीके द्वारा लाया, खाया अथवा देखा गया हो तथा जो और किसी दोषसे युक्त हो—ऐसा कोई भी खाने-पीनेका सामान तुम्हारी पुष्टिके लिये मैं तुम्हें देता हूँ।