संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished296 पृष्ठ
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मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना < १८१
| (चित्र) | बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।<br>तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्॥ ५६ ॥<br>सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।<br>सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ ५७ ॥<br>संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ ५८ ॥<br>ऋषि बोले— ॥ ४६ ॥ महाभाग! विषयमार्गका ज्ञान सब जीवोंको है॥ ४७ ॥ इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं। कुछ प्राणी दिनमें नहीं देखते और दूसरे रातमें ही नहीं देखते॥ ४८ ॥ तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रिमें भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं; किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते॥ ४९ ॥ पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्योंकी समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियोंकी होती है॥ ५० ॥ तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्रायः दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ! क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया |
| ऋषिरुवाच॥ ४६ ॥<br>ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥ ४७ ॥<br>विषयश्चै<sup>१</sup> महाभाग यांति<sup>२</sup> चैवं पृथक् पृथक्।<br>दिवाऽन्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥ ४८ ॥<br>केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।<br>ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किंतु ते<sup>३</sup> न हि केवलम्॥ ४९ ॥<br>यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।<br>ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥ ५० ॥<br>मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।<br>ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥ ५१ ॥<br>कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।<br>मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥ ५२ ॥<br>लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान्<sup>४</sup> किं न पश्यसि।<br>तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥ ५३ ॥<br>महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणौ<sup>५</sup>।<br>तन्नात्र विस्मयः कार्यों योगनिद्रा जगत्पतेः॥ ५४ ॥<br>महामाया हरेश्चैषा<sup>६</sup> तया संमोह्यते जगत्।<br>ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ ५५ ॥ |
१. पा०—याश्च। २. पा०—यान्ति। ३. पा०—किंतु ते। ४. पा०—नन्वेते। ५. पा०—रिणः। ६. पा०—चैतत्।