भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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• मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना • १८३


ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्‌को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान् विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्‌को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेजःस्वरूप भगवान् विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे ॥६४-७१॥<br><br>ब्रह्मोवाच ॥७२॥<br>त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ॥७३॥<br>सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।<br>अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥७४॥<br>त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।<br>त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सूज्यते जगत् ॥७५॥<br>त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।<br>विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥७६॥<br>तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये।<br>महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥७७॥<br>महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।<br>प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥७८॥<br>कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।<br>त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥७९॥<br>लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च।<br>खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥८०॥<br>शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।<br>सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८१॥<br>परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी<sup></sup><br>यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥८२॥<br>तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा<sup></sup><br>यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति<sup></sup> यो जगत् ॥८३॥सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः।<br>विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥८४॥<br>कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।<br>सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥८५॥<br>मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।<br>प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥८६॥<br>बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥८७॥<br><br>ब्रह्माजीने कहा— ॥७२॥ देवि ! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार—इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्री और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शङ्ख और

१. पा०—सा त्वं। २. पा०—महेश्वरी। ३. पा०—तया। ४. पा०—पातात्ति।