संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना * १८५
महामायाने भी उन्हें मोहमें डाल रखा था; इसलिये वे भगवान् विष्णुसे कहने लगे—'हम तुम्हारी वीरतासे संतुष्ट हैं; तुम हमलोगोंसे कोई वर माँगो'॥ ८९–९५॥
श्रीभगवानुवाच ॥ ९६ ॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥ ९७ ॥
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं ममे^१ ॥ ९८ ॥
श्रीभगवान् बोले— ॥ ९६ ॥ यदि तुम दोनों मुझपर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथसे मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वरसे क्या लेना है॥ ९७-९८॥
ऋषिरुवाच ॥ ९९ ॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥ १०० ॥
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः^२।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥ १०१ ॥
ऋषि कहते हैं— ॥ ९९ ॥ इस प्रकार धोखेमें आ जानेपर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत्में जल ही-जल देखा तब कमलनयन भगवान्से कहा—'जहाँ पृथ्वी जलमें डूबी हुई न हो—जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो'॥ १००–१०१॥
ऋषिरुवाच ॥ १०२ ॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।
कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ १०३ ॥
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ॥ ऐं ॐ ॥ १०४ ॥
ऋषिकहते हैं— ॥ १०२ ॥ तब 'तथास्तु' कहकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्ने उन दोनोंके मस्तक अपनी जाँघपर रखकर चक्रसे काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजीकी स्तुति करनेपर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ १०३–१०४॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
उवाच १४, अर्धश्लोकाः २४, श्लोकाः ६६, एवम् ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'मधु-कैटभ-वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
१. पा०- मया। २. मार्कण्डेयपुराणकी कई प्रतियोंमें यहाँ 'प्रीतो स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः।' इतना अधिक पाठ है।
[ 539 ] सं० मा० पु०—७