संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
राजन्! यदि आज तुम मुझे दक्षिणा न दोगे तो सूर्यास्त होनेपर तुम्हें निश्चय ही शाप दे दूँगा।' इतना कहकर विश्वामित्र चले गये। इधर राजा हरिश्चन्द्र उनके भयसे व्याकुल हो उठे। सोचने लगे—'हाय! मैं अधम कहाँ भागकर जाऊँ।' उनकी दशा क्रूर स्वभाववाले धनीसे पीड़ित निर्धन पुरुषकी-सी हो रही थी। उस समय उनकी पत्नीने फिर कहा—'नाथ! मेरी बात मानकर वैसा ही कीजिये, अन्यथा आपको शापाग्निसे दग्ध होकर मरना पड़ेगा।' जब पत्नीने बार-बार उन्हें प्रेरित किया, तब राजा बोले—'कल्याणी! मैं बड़ा निर्दयी हूँ। लो, अब तुम्हें बेचने चलता हूँ। क्रूर-से-क्रूर मनुष्य भी जो कार्य नहीं कर सकते, वही आज मैं करूँगा।' पत्नीसे यों कहकर राजा व्याकुलचित्तसे नगरमें गये और नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे बोले।
राजा ने कहा—ओ नागरिको! तुम सब लोग मेरी बात सुनो, क्या तुम मेरा परिचय पूछ रहे हो? लो, सुनो, मैं मनुष्य नहीं, अत्यन्त क्रूर प्राणी हूँ; क्योंकि अपनी प्राणप्यारी पत्नीको यहाँ बेचनेके लिये आया हूँ। यदि आपलोगोंमेंसे किसीको मेरी इस प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा पत्नीसे दासीका काम लेनेकी आवश्यकता हो तो वह शीघ्र बोले; इस असह्य दुःखमें भी जबतक मैं जीवन धारण किये हुए हूँ, तभीतक बात कर ले।
तदनन्तर कोई बूढ़ा ब्राह्मण सामने आकर राजासे बोला—'दासीको मेरे हवाले करो। मैं इसे धन देकर खरीदता हूँ। मेरे पास धन बहुत है और मेरी प्यारी पत्नी अत्यन्त सुकुमारी है। वह घरके काम-काज नहीं कर सकती। इसलिये यह दासी मुझे दे दो। तुम अपनी इस पत्नीकी कार्यदक्षता, अवस्था, रूप और स्वभावके अनुरूप यह धन लो और इसे मेरे हवाले करो।' ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजा हरिश्चन्द्रका हृदय दुःखसे विदीर्ण हो गया। वे उसे कोई उत्तर न दे सके। तब उस ब्राह्मणने राजाके वल्कल-वस्त्रमें उस धनको अच्छी तरह बाँध दिया और उनकी पत्नीको खींचकर वह अपने साथ ले चला। माताको इस दशामें देखकर बालक रोहिताश्व रो उठा और हाथसे उसका वस्त्र पकड़कर अपनी ओर खींचने