संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| रक्तबीज-वध | १९७ |
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अष्टमोऽध्यायः
रक्तबीज-वध
| ध्यान | एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम्। |
| (‘ॐ' अरुणां करुणातरङ्गित्ताक्षीं धृतपाशाङ्कुशबाणचापहस्ताम्। | भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः ॥ १२ ॥ |
| अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम् ॥ | ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः। |
| मैं अणिमा आदि सिद्धिमयी किरणोंसे आवृत भवानीका ध्यान करता हूँ। उनके शरीरका रंग लाल है। नेत्रोंमें करुणा लहरा रही है तथा हाथोंमें पाश, अङ्कुश, बाण और धनुष शोभा पाते हैं।) | शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥ १३ ॥ |
| ऋषिरुवाच ॥ १ ॥ | यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनम्। |
| तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ ॥ १४ ॥ | |
| हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः। | |
| ‘ॐ' चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते। | आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते ॥ १५ ॥ |
| बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥ २ ॥ | माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी। |
| ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापनान्। | महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा ॥ १६ ॥ |
| उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ॥ ३ ॥ | कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना। |
| अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः । | योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी ॥ १७ ॥ |
| कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ॥ ४ ॥ | तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता। |
| कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै। | शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥ १८ ॥ |
| शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥ ५ ॥ | यज्ञवाराहमतुलं³ रूपं या बिभ्रतो⁴ हरेः। |
| कालका दौर्हदा मौर्याः कालकेयास्तथासुराः। | शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥ १९ ॥ |
| युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम ॥ ६ ॥ | नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः। |
| इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः । | प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥ २० ॥ |
| निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥ ७ ॥ | वज्रहस्ता तथैवेन्द्री गजराजोपरि स्थिता। |
| आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम्। | प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥ २१ ॥ |
| ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥ ८ ॥ | ऋषि कहते हैं— ॥ १ ॥ चण्ड और मुण्ड |
| ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप। | नामक दैत्योंके मारे जाने तथा बहुत-सी सेनाका |
| घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका² चोपबृंहयत् ॥ ९ ॥ | संहार हो जानेपर दैत्योंके राजा प्रतापी शुम्भके |
| धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा। | मनमें बड़ा क्रोध हुआ और उसने दैत्योंकी |
| निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥ १० ॥ | सम्पूर्ण सेनाको युद्धके लिये कूच करनेकी आज्ञा |
| तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम्। | दी ॥ २-३ ॥ वह बोला—'आज उदायुध नामके |
| देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥ ११ ॥ | छियासी दैत्य-सेनापति अपनी सेनाओंके साथ |
| युद्धके लिये प्रस्थान करें। कम्बु नामवाले दैत्योंके |
१. पा०—स च। २. पा०—तन्नादानम्बिका। ३. पा०—जज्ञे वाराहं। ४. पा०—तौ।
[ 539 ] सं० पा० पृ०—८