संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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निशुम्भ-वध २२३
नवमोऽध्यायः
निशुम्भ-वध
| ध्यान | संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः ॥ ७ ॥ |
|---|---|
| ( ॐ बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालां | आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः। |
| पाशाङ्कुशौ च वरदां निजबाहुदण्डैः। | निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः ॥ ८ ॥ |
| बिभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र- | ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः। |
| मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि ॥ | शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः ॥ ९ ॥ |
| मैं अर्धनारीश्वरके श्रीविग्रहकी निरन्तर शरण लेता हूँ। उसका वर्ण बन्धूकपुष्प और सुवर्णके समान रक्त-पीतमिश्रित है। वह अपनी भुजाओंमें सुन्दर अक्षमाला, पाश, अङ्कुश और वरद-मुद्रा धारण करता है; अर्धचन्द्र उसका आभूषण है तथा वह तीन नेत्रोंसे सुशोभित है।) | चिच्छेदास्ताञ्शरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः१।<br>ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ ॥ १० ॥<br>निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम्।<br>अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम् ॥ ११ ॥<br>ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम्।<br>निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम् ॥ १२ ॥<br>छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः। |
| राजोवाच ॥ १ ॥ | तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम् ॥ १३ ॥ |
| ' ॐ' विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम। | कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः। |
| देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजसमाश्रितम् ॥ २ ॥ | आयातं २ मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत् ॥ १४ ॥ |
| भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते। | आविद्ध्याथ ३ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति। |
| चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः ॥ ३ ॥ | सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता ॥ १५ ॥ |
| राजाने कहा-॥ १ ॥ भगवन् ! आपने रक्तबीजके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला देवी-चरित्रका यह अद्भुत माहात्म्य मुझे बतलाया ॥ २ ॥ अब रक्तबीजके मारे जानेपर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए शुम्भ और निशुम्भने जो कर्म किया, उसको मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥ | ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम्।<br>आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले ॥ १६ ॥<br>तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे।<br>भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम् ॥ १७ ॥<br>स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः। |
| ऋषिरुवाच ॥ ४ ॥ | भुजैरष्टाभिरतुलैर्र्व्याप्याशेषं बभौ नभः ॥ १८ ॥ |
| चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते। | तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत्। |
| शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे ॥ ५ ॥ | ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम् ॥ १९ ॥ |
| हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन्। | पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च। |
| अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया ॥ ६ ॥ | समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना ॥ २० ॥ |
| तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः। | ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः।<br>पूरयामास गगनं गां तथैव ४ दिशो दश ॥ २१ ॥ |
१. पा०—ऽऽशु शरोत्करैः। २. पा०—आधान्तं। ३ पा०—अभ्रान्त। ४. पा०—तथोपदिशो।