संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२२८ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
| (संस्कृत श्लोक) | (संस्कृत श्लोक) |
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| ऋषिरुवाच ॥ ९ ॥ | स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः<sup>५</sup> । |
| ततः प्रवृत्ते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः । | अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥ २५ ॥ |
| पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥ १० ॥ | तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् । |
| शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथास्त्रैश्चैव दारुणैः । | जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥ २६ ॥ |
| तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥ ११ ॥ | स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः । |
| दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका । | चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥ २७ ॥ |
| बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥ १२ ॥ | ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि । |
| मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी । | जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥ २८ ॥ |
| बभञ्ज लीलयैवो<sup>१</sup>ग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ॥ १३ ॥ | उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः । |
| ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः । | सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥ २९ ॥ |
| सापि<sup>२</sup> तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥ १४ ॥ | ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः । |
| छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे । | बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥ ३० ॥ |
| चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥ १५ ॥ | अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः । |
| ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् । | ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥ ३१ ॥ |
| अभ्यधावत्तदा<sup>३</sup> देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥ १६ ॥ | जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ॥ ॐ ॥ ३२ ॥ |
| तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका । | (हिन्दी अनुवाद) |
| धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम्<sup>४</sup> ॥ १७ ॥ | ऋषि कहते हैं— ॥ ९ ॥ तदनन्तर देवी और |
| हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः । | शुम्भ दोनोंमें सब देवताओं तथा दानवोंके देखते- |
| जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥ १८ ॥ | देखते भयङ्कर युद्ध छिड़ गया ॥ १० ॥ बाणोंकी |
| चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः । | वर्षा तथा तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रोंके प्रहारके |
| तथापि सोऽभ्यधावन्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥ १९ ॥ | कारण उन दोनोंका युद्ध सब लोगोंके लिये बड़ा |
| स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः । | भयानक प्रतीत हुआ ॥ ११ ॥ उस समय अम्बिका |
| देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥ २० ॥ | देवीने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज |
| तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले । | शुम्भने उनके निवारक अस्त्रोंद्वारा काट डाला ॥ १२ ॥ |
| स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥ २१ ॥ | इसी प्रकार शुम्भने भी जो दिव्य अस्त्र चलाये, |
| उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः । | उन्हें परमेश्वरीने भयङ्कर हुङ्कार शब्दके उच्चारण |
| तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥ २२ ॥ | आदिद्वारा खिलवाड़में ही नष्ट कर डाला ॥ १३ ॥ |
| नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् । | तब उस असुरने सैकड़ों बाणोंसे देवीको आच्छादित |
| चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥ २३ ॥ | कर दिया। यह देख क्रोधमें भरी हुई उन देवीने |
| ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह । | भी बाण मारकर उसका धनुष काट डाला ॥ १४ ॥ |
| उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥ २४ ॥ | धनुष कट जानेपर फिर दैत्यराजने शक्ति हाथमें ली, किन्तु देवीने चक्रसे उसके हाथकी शक्तिको |
१. पा०—हू० । २. पा०—सा च । ३. पा०—वत तां हन्तुं दैत्या० । ४. इसके बाद किसी-किसी प्रतिमें—‘अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह।’ इतना अधिक पाठ है। ५. पा०—वेगवान् ।