संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- सुरथ और वैश्यको देवीका वरदान * | २३९
त्रयोदशोऽध्यायः
सुरथ और वैश्यको देवीका वरदान
| ध्यान | प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्। | | ( ॐबालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्। | निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च ॥ ८ ॥ | | पाशाङ्कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥ | जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने। | | जो उदयकालके सूर्यमण्डलकी-सी कान्ति धारण करनेवाली हैं, जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथोंमें पाश, अङ्कुश, वर एवं अभयकी मुद्रा धारण किये रहती हैं, उन शिवा देवीका मैं ध्यान करता हूँ।) | संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः ॥ ९ ॥<br>स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन्।<br>तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् ॥ १० ॥<br>अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः।<br>निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ ॥ ११ ॥ | | ऋषिरुवाच॥ १ ॥ | ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम्। | | 'ॐ' एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्। | एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ॥ १२ ॥ | | एवं प्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ॥ २ ॥ | परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ॥ १३॥ | | विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया। | मार्कण्डेयजी कहते हैं— ॥ ६॥ क्रौष्टुकिजी! | | तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः ॥ ३ ॥ | मेधामुनिके ये वचन सुनकर राजा सुरथने उत्तम | | मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे। | व्रतका पालन करनेवाले उन महाभाग महर्षिको | | तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ॥ ४ ॥ | प्रणाम किया। वे अत्यन्त ममता और राज्यापहरणसे | | आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥ ५ ॥ | बहुत खिन्न हो चुके थे॥ ७-८॥ महामुने! | | ऋषि कहते हैं— ॥ १॥ राजन्! इस प्रकार | इसलिये विरक्त होकर वे राजा तथा वैश्य | | मैंने तुमसे देवीके अनुपम माहात्म्यका वर्णन | तत्काल तपस्याको चले गये और वे जगदम्बाके | | किया। जो इस जगत्को धारण करती हैं, उन | दर्शनके लिये नदीके तटपर रहकर तपस्या करने | | देवीका ऐसा ही प्रभाव है॥२॥ वे ही | लगे ॥ ९ ॥ वे वैश्य उत्तम देवीसूक्तका जप करते | | विद्या (ज्ञान) उत्पन्न करती हैं। भगवान् विष्णुकी | हुए तपस्यामें प्रवृत्त हुए। वे दोनों नदीके तटपर | | मायास्वरूपा उन भगवतीके द्वारा ही तुम, ये | देवीकी मृण्मयी मूर्ति बनाकर पुष्प, धूप और | | वैश्य तथा अन्यान्य विवेकी जन मोहित होते | हवन आदिके द्वारा उनकी आराधना करने लगे। | | हैं, मोहित हुए हैं तथा आगे भी मोहित होंगे। | उन्होंने पहले तो आहारको धीरे-धीरे कम | | महाराज! तुम उन्हीं परमेश्वरीकी शरणमें | किया; फिर बिल्कुल निराहार रहकर देवीमें ही | | जाओ॥ ३-४॥ आराधना करनेपर वे ही | मन लगाये एकाग्रतापूर्वक उनका चिन्तन आरम्भ | | मनुष्योंको भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान | किया ॥ १०-११ ॥ वे दोनों अपने शरीरके रक्तसे | | करती हैं॥ ५॥ | प्रोक्षित बलि देते हुए लगातार तीन वर्षोंतक | | मार्कण्डेय उवाच॥ ६ ॥ | संयमपूर्वक आराधना करते रहे॥ १२॥ इसपर | | इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः ॥ ७ ॥ | प्रसन्न होकर जगत्को धारण करनेवाली चण्डिका |