संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
शिष्यने 'बहुत अच्छा' कहकर इसे स्वीकार किया, तब अपने छोटे भाईके बुलानेपर भूति मुनि उनके यज्ञमें चले गये। इधर शान्ति गुरुभक्तिके वशमें होकर उन महात्मा गुरुकी सेवाके लिये जबतक समिधा, फूल और फल आदि जुटाते रहे तथा अन्य आवश्यक कार्य करते रहे, तबतक भूति मुनिके द्वारा रक्षित अग्नि शान्त हो गयी। अग्निको शान्त हुआ देख शान्तिको बड़ा दुःख हुआ और वे भूतिके भयसे बहुत चिन्तित हुए। उन्होंने सोचा, 'यदि इस अग्निके स्थानमें मैं दूसरी अग्नि स्थापित करूँ तो सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले मेरे गुरु अवश्य ही मुझे भस्म कर डालेंगे, मैं पापी अपने गुरुके क्रोध और शापका कारण बनूँगा! मुझे अपने लिये उतना शोक नहीं है, जितना कि गुरुके अपराध करनेका शोक है। अग्नि शान्त हुई देख गुरुदेव मुझे निश्चय ही शाप दे देंगे। जिनके प्रभावसे डरकर देवता भी उनके शासनमें रहते हैं, वे मुझ अपराधीको शापसे दग्ध न करें, इसके लिये क्या उपाय हो सकता है?'
अपने गुरुके डरसे डरे हुए बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शान्ति मुनिने इस तरह अनेक प्रकारसे सोच-विचार करके अग्निदेवकी शरण ली। उसने मनपर संयम किया और पृथ्वीपर घुटने टेक हाथ जोड़ एकाग्रचित्त हो स्तोत्र आरम्भ किया।
शान्तिने कहा—समस्त प्राणियोंके साधक महात्मा अग्निदेवको नमस्कार है। उनके एक, दो और पाँच स्थान हैं। वे राजसूय-यज्ञमें छः स्वरूप धारण करते हैं। समस्त देवताओंको वृत्ति देनेवाले अत्यन्त तेजस्वी अग्निदेवको नमस्कार है। जो सम्पूर्ण जगत्के कारणरूप तथा पालन करनेवाले हैं, उन अग्निदेवको प्रणाम है। अग्ने! तुम सम्पूर्ण देवताओंके मुख हो। भगवन्! तुम्हारे द्वारा ग्रहण किया हुआ हविष्य सब देवताओंको तृप्त करता है। तुम्हीं समस्त देवताओंके प्राण हो। तुममें हवन किया हुआ हविष्य अत्यन्त पवित्र होता है, फिर वही मेघ बनकर जलरूपमें परिणत हो जाता है। फिर उस जलसे सब प्रकारके अन्न आदि उत्पन्न होते हैं। अनिलसारथे! फिर उन समस्त अन्न आदिसे सब जीव सुखपूर्वक जीवन धारण करते हैं। अग्निदेव! तुम्हारे द्वारा उत्पन्न की हुई ओषधियोंसे मनुष्य यज्ञ करते हैं। यज्ञोंसे देवता, दैत्य तथा राक्षस तृप्त होते हैं। हुताशन! उन यज्ञोंके आधार तुम्हीं हो, अतः अग्ने! तुम्हीं सबके आदिकारण और सर्वरूप हो। देवता, दानव, यक्ष, दैत्य, गन्धर्व, राक्षस, मनुष्य, पशु वृक्ष, मृग, पक्षी तथा सर्प—ये सभी तुमसे ही तृप्त होते और तुम्हींसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं। तुम्हींसे इनकी उत्पत्ति है और तुम्हींमें इनका लय होता है। देव! तुम्हीं जलकी सृष्टि करते और तुम्हीं उसको पुनः सोख लेते हो। तुम्हारे पकानेसे ही जल प्राणियोंकी पुष्टि करता है। तुम देवताओंमें तेज, सिद्धोंमें कान्ति, नागोंमें विष और पक्षियोंमें वायुरूपसे स्थित हो। मनुष्योंमें क्रोध, पक्षी और मृग आदिमें मोह, वृक्षोंमें स्थिरता, पृथ्वीमें कठोरता, जलमें द्रवत्व तथा वायुमें जलरूपसे तुम्हारी स्थिति है। अग्ने! व्यापक होनेके कारण तुम आकाशमें आत्मारूपसे स्थित हो। अग्निदेव! तुम सम्पूर्ण भूतोंके अन्तःकरणमें विचरते तथा सबका पालन करते हो। विद्वान् पुरुष तुमको एक कहते हैं, तथा फिर वे ही तुम्हें तीन प्रकारका बतलाते हैं। तुम्हें आठ रूपोंमें कल्पित करके ऋषियोंने आदियज्ञका अनुष्ठान किया था। महर्षिगण इस विश्वको तुम्हारी सृष्टि बतलाते हैं। हुताशन! तुम्हारे बिना यह सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा। ब्राह्मण हव्य-कव्य आदिके द्वारा 'स्वाहा' और 'स्वधा' का उच्चारण करते हुए तुम्हारी पूजा करके