भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


हविष्यका साक्षात् भोजन करते हो, इसलिये बड़े-बड़े यज्ञोंमें नियमपरायण महर्षिगण सदा तुम्हारी पूजा करते हैं। तुम यज्ञमें स्तुत होकर सोमपान करते हो तथा वषट्का उच्चारण करके इन्द्रके उद्देश्यसे दिये हुए हविष्यको भी तुम्हीं भोग लगाते हो और इस प्रकार पूजित होकर तुम सम्पूर्ण विश्वका कल्याण करते हो। विप्रगण अभीष्ट फलकी प्राप्तिके लिये सदा तुम्हारा ही यजन करते हैं। सम्पूर्ण वेदाङ्गोंमें तुम्हारी महिमाका गान किया जाता है। यज्ञपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारी ही प्रसन्नताके लिये सर्वदा अङ्गोंसहित वेदोंका पठन-पाठन करते रहते हैं। तुम्हीं यज्ञपरायण ब्रह्मा, सब भूतोंके स्वामी भगवान् विष्णु, देवराज इन्द्र, अर्यमा, जलके स्वामी वरुण, सूर्य तथा चन्द्रमा हो। सम्पूर्ण देवता और असुर भी तुम्हींको हविष्योंद्वारा संतुष्ट करके मनोवाञ्छित फल प्राप्त करते हैं। कितने ही महान् दोषसे दूषित वस्तु क्यों न हो, वह सब तुम्हारी ज्वालाओंके स्पर्शसे शुद्ध हो जाती है। सब स्नानोंमें तुम्हारे भस्मसे किया हुआ स्नान ही सबसे बढ़कर है, इसीलिये मुनिगण सन्ध्याकालमें उसका विशेष रूपसे सेवन करते हैं। शुचि नामवाले अग्निदेव! मुझपर प्रसन्न होओ। वायुरूप! मुझपर प्रसन्न होओ। अत्यन्त निर्मल कान्तिवाले पावक! मुझपर प्रसन्न होओ। विद्युत्सख! आज मुझपर प्रसन्न होओ। हविष्यभोजी अग्निदेव! तुम मेरी रक्षा करो। वह्ने! तुम्हारा जो कल्याणमय स्वरूप है, देव! तुम्हारे जो सात जालामयी जिह्वाएँ हैं, उन सबके द्वारा तुम मेरी रक्षा करो—ठीक उसी तरह, जैसे पिता अपने पुत्रकी रक्षा करता है। मैंने तुम्हारी स्तुति की है।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुने! शान्तिके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् अग्निदेव ज्वालाओंसे घिरे हुए उनके समक्ष प्रकट हुए। ब्रह्मन्! अग्निदेव उस स्तोत्रसे बहुत संतुष्ट थे। शान्ति उनके चरणोंमें पड़ गये; फिर उन्होंने मेघके समान गम्भीर वाणीमें शान्तिसे कहा—‘विप्रवर! तुमने जो भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन किया है, उससे मैं सन्तुष्ट हूँ और तुम्हें वर देना चाहता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, माँग लो।’

शान्तिने कहा— भगवन्! मैं तो कृतार्थ हो गया, क्योंकि आज आपके दिव्य स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कर रहा हूँ। तथापि मैं भक्तिसे विनीत होकर जो कुछ आपसे कहता हूँ, उसे आप सुनें। देव! मेरे आचार्य अपने आश्रमसे भाईके यज्ञमें गये हैं। वे जब लौटकर आयें तो इस स्थानको आपसे सनाथ देखें। साथ ही यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो यह दूसरा वर भी दीजिये। मेरे गुरुदेवके कोई पुत्र नहीं है, उन्हें कोई सुयोग्य पुत्र प्राप्त हो; फिर उस पुत्रमें वे जितना स्नेह करें, उतना ही सम्पूर्ण भूतोंके प्रति भी उनका स्नेह हो। उनका हृदय सबके प्रति कोमल बन जाय।

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