संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 279, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें• क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७९
राजाने कहा—बहुत कहनेसे क्या लाभ, तुम ब्रह्मचर्यको छोड़ो और अपनी माताके इच्छानुसार मुझे पौत्रका मुख दिखाओ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—जब पुत्रके बहुत कहनेपर भी राजाने दूसरी कोई वस्तु नहीं माँगी, तब उन्होंने कहा—'पिताजी! मैं आपको किमिच्छक दान देकर बड़े सङ्कटमें पड़ गया। अब निर्लज्ज होकर फिर विवाह करूँगा। स्त्रीके सामने परास्त हुआ और पृथ्वीपर गिराया गया; फिर भी मुझे स्त्रीका स्वामी बनना पड़ेगा, यह बड़ा ही दुष्कर कर्म है। तथापि मैं क्या करूँ, सत्यके बन्धनमें बँधा हूँ। आपने जो आज्ञा दी है, वह करूँगा।'
एक दिन राजकुमार अवीक्षित शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ वे हरिण, वराह तथा व्याघ्र आदि जन्तुओंको अपने बाणोंका निशाना बनाने लगे। इतनेमें ही उन्हें सहसा किसी स्त्रीके रोनेका शब्द सुनायी दिया। वह भयसे गद्गदवाणीमें उच्चस्वरसे बार-बार क्रन्दन करती हुई त्राहि-त्राहिकी रट लगा रही थी। राजकुमार अवीक्षितने 'मत डरो, मत डरो' ऐसा कहते हुए अपने घोड़ेको उसी ओर बढ़ाया, जिधरसे वह शब्द आ रहा था। उस निर्जन वनमें दनुके पुत्र दृढ़केशके द्वारा पकड़ी गयी वह कन्या विलाप करती हुई कह रही थी, 'मैं महाराज करन्धमके पुत्र अवीक्षितकी पत्नी हूँ, किन्तु यह नीच दानव मुझे हरकर लिये जाता है। जिन महाराजके समक्ष समस्त राजा, गन्धर्व तथा गुह्यक भी खड़े होनेकी शक्ति नहीं रखते, जिनका क्रोध मृत्यु और पराक्रम इन्द्रके समान है, उन्हींकी पुत्रवधू होकर आज मैं एक दानवके द्वारा हरी जा रही हूँ।'
वह इस प्रकार कह-कहकर रो ही रही थी कि राजकुमार अवीक्षित तुरंत वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने देखा, एक अत्यन्त मनोहर कन्या है, जो सब प्रकारके आभूषणोंसे शोभा पा रही है और हाथमें डंडा लिये दनु-पुत्र दृढ़केशने उसे पकड़ रखा है तथा वह करुण स्वरमें 'त्राहि-त्राहि' पुकार रही है। यह देखकर अवीक्षितने उससे कहा—'तुम भय न करो।' फिर उस दानवसे कहा—'ओ दुष्ट! अब तू मारा जायगा। भूमण्डलके समस्त राजा जिनके प्रतापके सामने मस्तक झुकाते हैं, उन महाराज करन्धमके राज्यमें कौन दुष्ट जीवित रह सकता है।' राजकुमारको श्रेष्ठ धनुष लिये आया देख वह कृशाङ्गी युवती बार-बार कहने लगी, 'आप मुझे बचाइये। यह दुष्ट मुझे हरकर लिये जाता है। मैं महाराज करन्धमकी पुत्रवधू और अवीक्षितकी पत्नी हूँ। सनाथ हूँ तो भी इस वनमें यह दुष्ट मुझे अनाथकी भाँति हरकर लिये जाता है।'
यह सुनकर अवीक्षित उसकी बातपर विचार करने लगे—'यह किस प्रकार मेरी भार्या तथा पिताजीकी पुत्रवधू हुई? अथवा इस समय तो इसे छुड़ाऊँ, फिर समझ लूँगा। पीड़ितोंकी रक्षा करनेके लिये ही क्षत्रिय हथियार धारण करते हैं।' ऐसा निश्चय करके वीर अवीक्षितने उस खोटी बुद्धिवाले दानवसे कुपित होकर कहा—'पापी! यदि जीवित रहना चाहता है तो इसे छोड़कर चला जा; अन्यथा तेरे प्राण नहीं बचेंगे।' इतना सुनते ही वह दानव उस कन्याको छोड़कर डंडेको ऊपर उठा अवीक्षितकी ओर दौड़ा। तब उन्होंने भी बाणोंकी वर्षासे उसे ढँक दिया। दानव दृढ़केश अत्यन्त मदसे मतवाला हो रहा था। राजकुमारके बाणोंसे रोके जानेपर भी उसने सौ कीलोंसे युक्त वह डंडा उनपर दे मारा; किन्तु राजकुमारने अपनी ओर आते हुए उस डंडेके बाण मारकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये। फिर दानवने कुपित होकर राजकुमारपर जो-जो हथियार चलाया, वह सब उन्होंने अपने बाणोंसे काट गिराया। डंडे और हथियारोंके कट