भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 296 में से

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पृष्ठ 288

२८८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


उद्गार प्रकट किया—'अहो! इस पृथ्वीपर कहीं एक भी निर्धन ब्राह्मण नहीं है, यह कितनी सुन्दर बात है!' तदनन्तर उन्होंने भक्तिपूर्वक बारंबार प्रणाम करके कुछ ब्राह्मणोंको ऋत्विज् बनाया और बहुत बड़ा यज्ञ आरम्भ किया। उस समय बड़े आश्चर्यकी बात यह हुई कि भूमण्डलके सभी ब्राह्मण यज्ञ करने लगे, इसलिये राजाके यज्ञ-मण्डपमें कोई सदस्य न बन सका। कुछ ब्राह्मण यजमान थे और कुछ यज्ञ करानेवाले पुरोहित बन गये। राजा नरिष्यन्तने जिस समय यज्ञ आरम्भ किया, उस समय पृथ्वीके समस्त ब्राह्मण उन्हींके दिये हुए धनसे यज्ञ करने लगे। पूर्व दिशामें अठारह करोड़, पश्चिममें सात करोड़, दक्षिणमें चौदह करोड़ और उत्तरमें पंद्रह करोड़ यज्ञ एक ही समय आरम्भ हुए। इस प्रकार मरुत्तनन्दन राजा नरिष्यन्त बड़े धर्मात्मा हुए। वे अपने बल और पुरुषार्थके लिये सर्वत्र प्रसिद्ध थे।

नरिष्यन्तके दम नामक पुत्र हुआ, जो दुष्ट शत्रुओंका दमन करनेवाला था। उसमें इन्द्रके समान बल और मुनियोंके समान दया एवं शील था। बभ्रुकी कन्या इन्द्रसेना नरिष्यन्तकी पत्नी थी। उसीके गर्भसे दमका जन्म हुआ था। उस महायशस्वी पुत्रने नौ वर्षतक माताके गर्भमें रहकर उनके द्वारा दमका पालन कराया तथा स्वयं भी दमशील था। इसीलिये त्रिकालवेत्ता पुरोहितने उसका नाम 'दम' रखा। राजकुमार दमने दैत्यराज वृषपर्वासे सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा पायी। तपोवनिवासी दैत्यराज दुन्दुभिसे सम्पूर्ण अस्त्र प्राप्त किये। महर्षि शक्तिसे वेदों तथा समस्त वेदाङ्गोंका अध्ययन किया और राजर्षि आर्ष्टिषेणसे योगविद्या प्राप्त की। वे सुन्दर रूपवान्, महात्मा, अस्त्रविद्याके ज्ञाता और महान् बलवान् थे; अतः राजकुमारी सुमनाने पिताद्वारा आयोजित स्वयंवरमें उन्हें अपना पति चुन लिया। वह दशार्ण देशके बलवान् राजा चारुवर्माकी पुत्री थी। उसकी प्राप्तिके लिये वहाँ जितने राजा आये थे, सब देखते ही रह गये और उसने दमका वरण कर लिया। मद्रराजकुमार महानन्द, जो बड़ा बलवान् और पराक्रमी था, सुमनाके प्रति अनुरक्त हो गया था; इसी प्रकार विदर्भ देशके राजा संक्रन्दनका राजकुमार वपुष्मान् तथा उदारबुद्धि महाधनु भी सुमनाकी ओर आकृष्ट थे। उन सबने देखा, सुमनाने दुष्ट शत्रुओंका दमन करनेवाले दमका वरण कर लिया; तब कामसे मोहित होकर आपसमें सलाह की—'हमलोग इस सुन्दरी कन्याको बलपूर्वक पकड़कर घर ले चलें। वहाँ यह स्वयंवरकी विधिसे हममेंसे जिसको वरण करेगी, उसीकी पत्नी होगी।'

ऐसा निश्चय करके उन तीनों राजकुमारोंने दमके पास खड़ी हुई उस सुन्दरी कन्याको पकड़ लिया। उस समय जो राजा दमके पक्षमें थे, उन्होंने बड़ा कोलाहल मचाया। कुछ लोग कुपित होकर रह गये और कुछ लोग मध्यस्थ बन गये। इस घटनासे दमके चित्तमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने चारों ओर खड़े हुए राजाओंको देखकर कहा—'भूपालगण! स्वयंवरको धार्मिक कार्योंमें गणना है, किन्तु वह वास्तवमें अधर्म है या धर्म? इस कन्याको इन लोगोंने जो बलपूर्वक पकड़ लिया है—यह उचित है या अनुचित? यदि स्वयंवर अधर्म है, तब तो मुझे इससे कोई मतलब नहीं है; यह भले ही दूसरेकी पत्नी हो जाय। किन्तु यदि वह धर्म है, तब तो वह मेरी पत्नी हो चुकी; उस दशामें इन प्राणोंको धारण करके क्या होगा, जो शत्रुको उपेक्षा करके बचाये जाते हैं।' तब दशार्णनरेश चारुवर्माने कोलाहल शान्त कराकर सभासदोंसे पूछा—'राजाओ! दमने जो

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