भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

३० • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •

प्रकारके रोगोंकी भयानक पीड़ाएँ सहन की हैं। गर्भावस्थामें मैंने जो अनेकों प्रकारके दुःख भोगे हैं, बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें भी जो क्लेश सहन किये हैं, वे सब मुझे याद आ रहे हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी योनियोंमें, फिर पशु, मृग, कीट और पक्षियोंकी योनियोंमें तथा राजसेवकों एवं युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले राजाओंके घरोंमें भी मेरे कई बार जन्म हो चुके हैं। इसी तरह अबकी बार आपके घरमें भी मैंने जन्म लिया है। मैं बहुत बार मनुष्योंका भृत्य, दास, स्वामी, ईश्वर और दरिद्र रह चुका हूँ। दूसरोंने मुझे और मैंने दूसरोंको अनेक बार दान दिये हैं। पिता, माता, सुहृद्, भाई और स्त्री इत्यादिके कारण कई बार संतुष्ट हुआ हूँ और कई बार दीन हो-होकर रोते हुए मुझे आँसुओंसे मुँह धोना पड़ा है। पिताजी! यों ही इस संसार-चक्रमें भटकते हुए मैंने अब वह ज्ञान प्राप्त किया है, जो मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। उस ज्ञानको प्राप्त कर लेनेपर अब यह ऋक्, यजु और सामवेदोक्त समस्त क्रिया कलाप गुणशून्य दिखायी देनेके कारण मुझे अच्छा नहीं लगता। अतः जब ज्ञान प्राप्त हो गया तब वेदोंसे मुझे क्या प्रयोजन है। अब तो मैं गुरु-विज्ञानसे परितृप्त, निरीह एवं सदात्मा हूँ। अतः छः प्रकारके भावविकार (जन्म, सत्ता, वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश), दुःख, सुख, हर्ष, राग तथा सम्पूर्ण गुणोंसे वर्जित उस परमपदरूप ब्रह्मको प्राप्त होऊँगा। पिताजी! जो राग, हर्ष, भय, उद्वेग, क्रोध, अमर्ष और वृद्धावस्थासे व्याप्त है तथा कुत्ते, मृग आदिकी योनिमें बाँधनेवाले सैकड़ों बन्धनोंसे युक्त है, उस दुःखकी परम्पराका परित्याग करके अब मैं चला जाऊँगा।'

पुत्रकी यह बात सुनकर महाभाग पिताका हृदय प्रसन्नतासे भर गया। उन्होंने हर्ष और विस्मयसे गद्गदवाणीमें अपने पुत्रसे कहा— 'बेटा! तुम यह क्या कहते हो? तुम्हें कहाँसे ज्ञान प्राप्त हो गया? पहले तुममें जड़ता क्यों थी और इस समय ज्ञान कहाँसे जग उठा? क्या यह मुनियों अथवा देवताओंके दिये हुए शापका विकार था, जिससे पहले तुम्हारा ज्ञान छिप गया था और इस समय पुनः प्रकट हो गया? मैं यह सारा रहस्य सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। बेटा! तुमपर पहले जो कुछ बीत चुका है, वह सब मुझे बताओ।'

पुत्रने कहा—पिताजी! मेरा जो यह सुख और दुःख देनेवाला पूर्व वृत्तान्त है, उसे सुनिये। इस जन्मके पहले पूर्वजन्ममें मैं जो कुछ था, वह सब बताता हूँ। पूर्वकालमें मैं परमात्माके ध्यानमें मन लगानेवाला एक ब्राह्मण था। आत्मविद्याके विचारमें मैं पराकाष्ठाको पहुँचा हुआ था। मैं सदा योगसाधनमें संलग्न रहता था। निरन्तर अभ्यासमें लगने, सत्पुरुषोंका सङ्ग करने, अपने स्वभावसे ही विचारपरायण होने, तत्त्वमसि आदि महावाक्योंके विचारने और तत्पदार्थके शोधन करने आदिके कारण उस परमात्मतत्त्वमें ही मेरी परम प्रीति हो गयी। फिर मैं शिष्योंके सन्देहका निवारण करनेवाला आचार्य बन गया। फिर बहुत समयके पश्चात् मैं एकान्तसेवी हो गया; किन्तु दैवात् अज्ञानसे सद्भावका नाश हो जानेके कारण प्रमादमें पड़कर मेरी मृत्यु हो गयी। तथापि मृत्युकालसे लेकर अबतक मेरी स्मरणशक्तिका लोप नहीं हुआ। मेरे जन्मोंके जितने वर्ष बीत गये हैं, उन सबकी स्मृति हो आयी है। पिताजी! उस पूर्वजन्मके अभ्याससे ही जितेन्द्रिय होकर अब फिर मैं वैसा ही यत्न करूँगा, जिससे भविष्यमें फिर मेरा जन्म न हो। मैंने जो दूसरोंको ज्ञान दिया था, उसीका यह फल है कि मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है। केवल त्रयीधर्म (कर्मकाण्ड) का सहारा लेनेवाले मनुष्योंको इसकी प्राप्ति नहीं होती, अतः मैं इस प्रथम आश्रमसे ही संन्यास-धर्मका आश्रय ले एकान्तसेवी हो आत्माके