भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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४० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


हुए तेलमें पड़कर पक रहे हैं। लोहेके समान चोंचवाले पक्षी इन्हें नोच-नोचकर खोंच रहे हैं। ये कैसे लोग हैं? ये बेचारे शरीरकी नस-नाड़ियोंके कटनेसे पीड़ित हो बड़े जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते हैं। लोहेकी चोंचके आघातसे इनके सारे अङ्गोंमें घाव हो गया है, जिससे इन्हें बड़ा कष्ट होता है। इन्होंने ऐसा कौन-सा अनिष्ट किया है, जिसके कारण ये रात-दिन सताये जा रहे हैं? ये तथा और भी जो पापियोंकी यातनाएँ देखी जाती हैं, वे किन कर्मोंके परिणाम हैं? ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे बतलाओ।

यमदूतने कहा—राजन्! मनुष्यको पुण्य और पाप बारी-बारीसे भोगने पड़ते हैं। भोगनेसे ही पाप अथवा पुण्यका क्षय होता है। लाखों जन्मोंके सञ्चित पुण्य और पाप मनुष्योंके लिये सुख-दुःखका अंकुर उत्पन्न करते हैं। जैसे बीज जलकी इच्छा रखते हैं, उसी प्रकार पुण्य और पाप देश-काल, अन्यान्य कर्म और कर्ताकी अपेक्षा करते हैं। जैसे राह चलते समय काँटेपर पैर पड़ जानेसे उसके चुभनेपर थोड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार किसी भी देश-कालमें किया हुआ थोड़ा पाप थोड़े दुःखका कारण होता है; किन्तु वही पाप जब बहुत अधिक मात्रामें हो जाता है तब पैरमें शूल अथवा लोहेकी कील गड़नेके समान अधिक दुःख प्रदान करता है—सिरदर्द आदि दुस्सह रोगोंका कारण बनता है। जैसे अपथ्य भोजन और सर्दी-गर्मीका सेवन श्रम और ताप आदिका जनक होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न पाप भी फलकी प्राप्ति करानेमें एक-दूसरेकी अपेक्षा रखते हैं। ऐसे ही बड़े-बड़े पाप दीर्घकालतक रहनेवाले रोग और विकारोंके उत्पादक होते हैं। उन्हींसे शस्त्र और अग्निका भय प्राप्त होता है। वे ही असह्य पीड़ा और बन्धन आदि फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार जीव अनेक जन्मोंके सञ्चित पुण्य और पापोंके फलस्वरूप सुख और दुःखोंको भोगता हुआ इस लोकमें स्थित रहता है।

राजन्! जैसे नरकोंमें पड़े हुए जीव अपने घोर महापापका फल भोगते हैं, उसी प्रकार वे स्वर्गलोकमें देवताओंके साथ रहकर गन्धर्व, सिद्ध और अप्सराओंके संगीत आदिका सुख उठाते हुए पुण्योंका उपभोग करते हैं। देवता, मनुष्य और पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेकर जीव अपने पुण्य-पापजनित सुख-दुःखरूप शुभाशुभ फलोंको भोगता है। राजन्! आप जो यह पूछ रहे हैं कि किस-किस पापसे पापियोंको कौन-कौन-सी यातनाएँ मिलती हैं, वह सब मैं आपको बतला रहा हूँ। जो नीच मनुष्य कामना और लोभके वशीभूत हो दूषित दृष्टि एवं कलुषित चित्तसे परायी स्त्री और पराये धनपर आँखें गड़ाते हैं, उनकी दोनों आँखोंको ये वज्रतुल्य चोंचवाले पक्षी निकाल लेते हैं और पुनः-पुनः इनके नये नेत्र उत्पन्न हो जाते हैं। इन पापी मनुष्योंने जितने निमेषतक पापपूर्ण दृष्टिपात किया है, उतने ही हजार वर्षोंतक ये नेत्रकी पीड़ा भोगते हैं। जिन लोगोंने असत्-शास्त्रका उपदेश किया है तथा