भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

* जनक-यमदूत-संवाद, भिन्न-भिन्न पापोंसे विभिन्न नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन * ४३


जलमें मूत्र, थूक और विष्ठाका त्याग किया है, वे ही लोग इस समय थूक, विष्ठा और पूँयसे भरे हुए दुर्गन्धयुक्त नरकमें पड़े हैं। ये लोग जो भूखसे व्याकुल होनेपर एक-दूसरेका मांस खा रहे हैं, इन्होंने पूर्वकालमें अतिथियोंको भोजन दिये बिना ही भोजन किया है। जिन लोगोंने अग्निहोत्री होकर भी वेदों और वैदिक अग्नियोंका परित्याग किया है, वे ही ये पर्वतोंकी चोटीसे बारंबार नीचे गिराये जाते हैं।* जो लोग दूसरी बार ब्याही जानेवाली स्त्रीके पति होकर जीवन बिता चुके हैं, वे ही इस समय यहाँ कीड़े हुए हैं, जिन्हें चींटियाँ खा रही हैं। पतितोंका दिया हुआ दान लेने, उनका यज्ञ कराने तथा प्रतिदिन उनकी सेवामें रहनेसे मनुष्य पत्थरके भीतर कीड़ा होकर सदा निवास करता है। जो कुटुम्बके लोगों, मित्रों तथा अतिथिके देखते-देखते अकेले ही मिठाई उड़ाता है, उसे यहाँ जलते हुए अँगारे चबाने पड़ते हैं। राजन्! इस पापीने लोगोंकी पीठका मांस खाया है—पीठ-पीछे सबकी बुराई की है, इसीलिये भयङ्कर भेड़िये प्रतिदिन इसका मांस खा रहे हैं।†

इस नीचने उपकार करनेवाले लोगोंके साथ कृतघ्नता की है; अतएव यह भूखसे व्याकुल तथा अंधा, बहरा और गूँगा होकर भटक रहा है। इस खोटी बुद्धिवाले कृतघ्नने अपने मित्रोंकी बुराई की है, इसीलिये यह तप्तकुम्भ नरकमें गिर रहा है। इसके बाद चक्कियोंमें पीसा जायगा, फिर तपायी हुई बालूमें भूना जायगा। उसके बाद कोल्हूमें पेरा जायगा। तत्पश्चात् असिपत्रवनमें इसे यातना दी जायगी। फिर आरेसे यह चीरा जायगा। तदनन्तर कालसूत्रसे काटा जायगा। इसके बाद और भी बहुत-सी यातनाएँ इसे भोगनी पड़ेंगी। इसपर भी मित्रोंके साथ विश्वासघात


* अपविद्धास्तु यैर्वेदा यद्वच्चाग्निहोत्रिभिः। त इमे शैलशृङ्गाग्रात् पात्यन्तेऽधः पुनः पुनः॥ (अ० १४।८१)
† वृकैर्भयङ्करैः पृष्ठं नित्यमस्योपभुज्यते। पृष्ठमांसं नृपैतेन सतां क्रंकस्य भक्षितम्॥ (अ० १४।८५)