भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 83
* मदालसाका अलर्कको राजनीतिका उपदेश *७३
पतिके यों कहनेपर श्रेष्ठ नारी मदालसा अपने पुत्र अलर्कको बहलाती हुई इस प्रकार उपदेश देने लगी—मनमें सदा श्रीविष्णुभगवान्‌का चिन्तन करना, उनके ध्यानसे अन्तःकरणके काम क्रोध आदि छहों शत्रुओंको जीतना, ज्ञानके द्वारा मायाका निवारण करना और जगत्‌की अनित्यताका विचार करते रहना। धनकी आपके लिये राजाओंपर विजय प्राप्त करना, यशके लिये धनका सद्व्यय करना, परायी निन्दा सुननेसे डरते रहना तथा विपत्तिके समुद्रमें पड़े हुए लोगोंका उद्धार करना।
धन्योऽसि रे यो वसुधामशत्रु-<br>  रेकश्चिरं पालयितासि पुत्र।<br>तत्पालनादस्तु सुखोपभोगो<br>  धर्मात् फलं प्राप्स्यसि चामरत्वम् ॥<br>धरामरान् पर्वसु तर्पयेथाः<br>  समीहितं बन्धुषु पूरयेथाः।<br>हितं परस्मै हृदि चिन्तयेथा<br>  मनः परस्त्रीषु निवर्त्तयेथाः ॥<br>सदा मुरारिं हृदि चिन्तयेथा-<br>  स्तद्ध्यानतोऽन्तःषडरीञ्जयेथाः ।<br>मायां प्रबोधेन निवारयेथा<br>  ह्यनित्यतामेव विचिन्तयेथाः ॥<br>अर्थागमाय क्षितिपाञ्जयेथा<br>  यशोऽर्जनायार्थमपि व्ययेथाः ।<br>परापवादश्रवणाद्विभीथा<br>  विपत्समुद्राज्जनमुद्धरेथाः ॥वीर! तू अनेक यज्ञोंके द्वारा देवताओंको तथा धनके द्वारा ब्राह्मणों एवं शरणागतोंको सन्तुष्ट करना। कामनापूर्तिके द्वारा स्त्रियोंको प्रसन्न रखना और युद्धके द्वारा शत्रुओंके छक्के छुड़ाना। बाल्यावस्थामें तू भाई-बन्धुओंको आनन्द देना, कुमारावस्थामें आज्ञापालनके द्वारा गुरुजनोंको सन्तुष्ट रखना। युवावस्थामें उत्तम कुलको सुशोभित करनेवाली स्त्रीको प्रसन्न रखना और वृद्धावस्थामें वनके भीतर निवास करते हुए वनवासियोंको सुख देना।
राज्यं कुर्वन् सुहृदो नन्दयेथाः<br>  साधून् रक्षंस्तात यज्ञैर्यजेथाः।<br>दुष्टान् निघ्नन् बैरिणश्चाजिमध्ये<br>  गोविप्रार्थे वत्स मृत्युं व्रजेथाः ॥
बेटा ! तू धन्य है, जो शत्रुरहित होकर अकेला ही चिरकालतक इस पृथ्वीका पालन करता रहेगा। पृथ्वीके पालनसे तुझे सुखोपभोगकी प्राप्ति हो और धर्मके फलस्वरूप तुझे अमरत्व मिले। पर्वोंके दिन ब्राह्मणोंको भोजनके द्वारा तृप्त करना, बन्धु-बान्धवोंकी इच्छा पूर्ण करना, अपने हृदयमें दूसरोंकी भलाईका ध्यान रखना और परायी स्त्रियोंकी ओर कभी मनको न जाने देना। अपनेतात ! राज्य करते हुए अपने सुहृदोंको प्रसन्न रखना, साधु पुरुषोंकी रक्षा करते हुए यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का भजन करना, संग्राममें दुष्ट शत्रुओंका संहार करते हुए गौ और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राण निछावर कर देना।

मदालसाका अलर्कको राजनीतिका उपदेश

सुमति कहते हैं— इस प्रकार माताके द्वारा प्रतिदिन बहलाया जाता हुआ बालक अलर्क कुछ बड़ी अवस्थाको प्राप्त हुआ। कुमारावस्थामें पहुँचनेपर उसका उपनयन-संस्कार हुआ। तत्पश्चात् उस बुद्धिमान् राजकुमारने माताको प्रणाम करके कहा—'माँ!मुझे इस लोक और परलोकमें सुख प्राप्त करनेके लिये यहाँ क्या करना चाहिये? यह सब मुझे बताओ।'<br>मदालसा बोली— बेटा ! राज्याभिषेक होनेपर राजाको उचित है कि वह अपने धर्मके अनुकूल