संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- मदालसाका अलर्कको राजनीतिका उपदेश * ८५
राजाको पहले काम आदि शत्रुओंको जीतनेकी चेष्टा करनी चाहिये। उनके जीत लेनेपर विजय अवश्यम्भावी है। यदि राजा ही उनके वशमें हो गया तो वह नष्ट हो जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मद, पान और हर्ष—ये राजाका विनाश करनेवाले शत्रु हैं। राजा पाण्डु काममें आसक्त होनेके कारण मारे गये तथा अनुह्लाद क्रोधके कारण ही अपने पुत्रसे हाथ धो बैठा। यह विचारकर अपनेको काम और क्रोधसे अलग रखे। राजा पुरूरवा लोभसे मारे गये और वेनको मदके कारण ही ब्राह्मणोंने मार डाला। अनायुषके पुत्रको मानके कारण प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा तथा पुरञ्जयकी मृत्यु हर्षके कारण हुई; किन्तु महात्मा मरुत्तने इन सबको जीत लिया था, इसलिये वे सम्पूर्ण विश्वपर विजयी हुए। यह सोचकर राजा उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा त्याग करे। वह कौवे, कोयल, भौरे हरिन, साँप, मोर, हंस, मुर्गे और लोहेके व्यवहारसे शिक्षा ग्रहण करे।* राजा अपने शत्रुके प्रति उल्लूका-सा बर्ताव करे। जैसे उल्लू पक्षी रातमें सोये कौओंपर चुपचाप धावा करता है, उसी प्रकार राजा शत्रुको असावधान-दशामें ही उसपर आक्रमण करे तथा समयानुसार चींटीकी-सी चेष्टा करे—धीरे-धीरे आवश्यक वस्तुओंका संग्रह करता रहे।†
राजाको आगकी चिनगारियों तथा सेमलके बीजसे कर्त्तव्यकी शिक्षा लेनी चाहिये। जैसे आगकी छोटी-सी चिनगारी बड़े-से बड़े वनको जला डालनेकी शक्ति रखती है, उसी प्रकार
अदृष्टं नाशमाप्नोति स्रवन्नात् स्यन्दनाद्यथा। तथा राज्यात्सन्दिग्धे बहिर्यन्त्रविनिर्गमात् ॥
दुष्टादुष्टांश्च जानेयादप्यात्मानारेद्वांस्तथा। चरैश्चारांश्च शत्रोरन्वेष्टव्याः प्रयत्नतः ॥
विश्वासो न तु कर्तव्यो राज्ञा मित्रासखेष्वपि। कार्ययोगादमित्रेऽपि विश्वसीत नराधिपः ॥
स्थानवृद्धिक्षयज्ञेन षाड्गुण्यविदितात्मना। भवितव्यं नरेन्द्रेण न कामवशवर्तिना ॥
प्रणम्य मन्त्रिणाञ्चैव ततो भूत्वा नराधिपाः। ज्ञेयाश्चान्तरं पीय विश्वस्येत ततोऽरिभिः ॥
यस्त्वेतानविजिल्यैव वैरिणो विजिगीषते। सोऽजितात्माजितामात्यः शत्रुवर्गेण बाध्यते ॥
(२७। ४-११)
* तात्पर्य यह कि राजा कौवेके समान आलस्यरहित और सावधान हो। जैसे कोयल अपने अण्डेका कौवोंसे पालन करती है, वैसे ही राजा भी दूसरोंसे अपना कार्य साधन करे। वह भौंरोंके समान रसग्राही और मृगके समान सदा चौकन्ना रहे। जैसे सर्प बड़ा-बड़ा फन निकालकर दूसरोंको डराता और मेढकको चुपके-से निगल जाता है, उसी प्रकार राजा दूसरोंपर आतङ्क जमाये रहे और सहसा आक्रमण करके शत्रुको अपने अधीन कर ले। जैसे मोर अपने समेटे हुए पंखको कभी-कभी फैलाता है, उसी प्रकार राजा भी समयानुसार अपने संकुचित सैन्य और बलका विस्तार करे। वह हंसोंके समान नीर-क्षीरका विवेक करनेवाला गुणग्राही हो। मुर्गोंके समान रात रहते ही शयनसे उठकर कर्तव्यका विचार करे और लोहेकी भाँति शत्रुओंके लिये अभेद्य एवं कर्तव्यपालनमें कठोर हो।
† अस्मात्कामादयः पूर्वं जेयाः पुत्र महीभुजा। लभ्यते हि जयोऽवश्यं राज्ञा नश्यति तैर्जितः ॥
कामः क्रोधश्च लोभश्च मदो मानस्तथैव च। हर्षश्च शत्रवो ह्येते विनाशाय महीभृताम् ॥
कामरक्तोऽभवन्नाशं स्मृत्वा पाण्डुं निपातितम्। निवर्त्तयेत्तथा क्रोधादनुह्लादं हतात्मजम् ॥
हतमैलं तथा लोभान्मदाद्वैनं द्विजैर्हतम्। मानादनायुषः पुत्रं हतं हर्षात्पुरञ्जयम् ॥
एभिर्जितैर्जितं सर्वं मरुत्तेन महात्मना। स्मृत्वा विवर्जयेदेतान्दोषान् स्वीयान्यहीपतिः ॥
काककोकिलभृङ्गाणां मृगव्यालशिखण्डिनाम्। हंसकुक्कुटलोहानां शिक्षेत चरितं नृपः ॥
कौशिकस्य क्रियां कुर्याद् विपक्षे मनुजेश्वरः। चेष्टां पिपीलिकानां च काले भूयः प्रदर्शयेत् ॥
(२७। १२ १८)