मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ मार्क्सवाद और रामराज्य अनुसार 'यदि वह ऐसा करे तो संसद् ही नहीं, क्योंकि संसदीय सरकारका सार है जनमतद्वारा शासन ।' ब्रिटेनमे संवैधानिक नियमोके निर्माणमें जनताकी स्वीकृति प्राप्त की जाती है । अन्तर्राष्ट्रिय नियमोका स्रोत भी किसी जनश्रेष्ठकी आज्ञा नहीं हो सकती । किंतु विश्व-शान्तिकी भावना मानवता एवं सामाजिकता है। यातायातकी वृद्धिसे आजकल अन्तर्राष्ट्रिय जनमत सम्भव हो गया । कोई भी निरपेक्ष शासक जनमतका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । कोई भी निश्चित जनश्रेष्ठ अन्तर्राष्ट्रिय नियमो, संधियो एव नैतिकताको कुचल नहीं सकता । विश्वजनमतका विरोध करके किसी राज्यकी स्थिरता नहीं हो सकती । एकतावादके अनुसार 'निरपेक्षता राज्यकी सर्वश्रेष्ठ विशेषतां है। यह निरपेक्षता आन्तरिक तथा बाह्य—इन दो दृष्टियोसे होती है । आन्तरिक दृष्टिकोणसे राज्यका विरोध कोई व्यक्ति या समूह नही कर सकता, सभी उसके अधीन होते है ।' वर्जेसके मतानुसार राज्य नागरिकोको उनकी इच्छाके विरुद्ध बाध्य कर सकता है, अन्यथा अराजकता ही समझी जायगी । बाह्य नीतिकी दृष्टिसे राजसत्ताधारीका राज्यपर कोई नियन्त्रण सम्भव नही । अन्य राज्य भी उसे आज्ञा नहीं दे सकता । अन्तर्राष्ट्रिय नैतिकता, संधियाँ और नियम राजसत्ताधारी राज्य- को बाध्य नहीं कर सकते । उनका अनुकरण करना राज्यकी इच्छापर निर्भर है। एक- सत्तावादियोंके दृष्टिकोणसे अन्तर्राष्ट्रिय नियमोको नियम नही माना जा सकता, क्योकि उसकी पृष्ठभूमिमें राज्यकी तलवार नही होती । एकसत्तावादी दार्शनिक राज्योके पारस्परिक सम्बन्ध हाब्सके प्राकृतिक मनुष्योके सम्बन्धसे होता है। अर्थात् एक राज्य दूसरे राज्योके शत्रु होते हैं। भारतीय नीति-शास्त्रोके अनुसार स्वभावसे ही पड़ोसी राष्ट्रके साथ सङ्घर्षकी सम्भावना होती है और पडोसीके पडोसीके साथ मैत्रीकी सम्भावना होती है । अरिर्मित्रमरेर्मित्रं मित्रमित्रमतः परम् । तथारिमित्रमित्रं च विजिगीषोः पुरः स्मृतः॥ पार्ष्णिग्राहः स्मृतः पश्चादाक्रन्दस्तदनन्तरम्।आसारावनयोश्चैव विजिगीषोश्च पृष्ठतः॥ अरेश्च विजिगीषोश्च मध्यस्थो भूम्यनन्तरः । अनुग्रहे संहतयोर्निग्रहे व्यस्तयोः प्रभुः ॥ मण्डलाद्वहिरेतेषामुदासीनो वलाधिकः। अनुग्रहे संहतानां व्यस्तानां च वधे प्रभुः॥ ( अग्निपुरा० २४० । १—५ ) शत्रु, मित्र, शत्रु का मित्र, मित्रका मित्र और शत्रुके मित्रका मित्र—ये पाँच विजिगीषुके आगे तथा पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, पाष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार—ये चार विजिगीषुके पीछे रहते हैं । अरि तथा विजिगीषुमें यदि संधि हो जाय तो उन दोनोंपर निग्रह-अनुग्रह करनेकी क्षमता रखनेवाला तथा परस्पर समझौता न होनेपर दोनोंको दण्ड देनेकी क्षमता रखनेवाला 'मध्यम' होता है । इन सबमे उदासीन और इनके मण्डलमे बाहर सबके मिलनेपर अनुग्रह