मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशान्तिका पोषक है। उसके मतानुसार 'आदर्श राज्यका ध्येय विश्वशान्ति और सामाजिक प्रगति है।' इस ध्येयकी पूर्तिमें असफल होनेपर राज्यका नागरिकोद्वारा विरोध न्याय-संगत है। ग्रीनके अनुसार 'सामाजिक हितका स्थान व्यक्तिगत इच्छाओं एवं स्वार्थोंसे ऊँचा है।' व्यक्तिवादियोंके नैसर्गिक अधिकारोंका वह विरोधी था। 'समाज हितद्वारा ही व्यक्तिहित हो सकता है।' काण्टके अनुसार ही ग्रीन भी राज्यके नियमोको रुकावटोंकी रुकावट मानता था। अर्थात् नैतिक जीवनकी रुकावटोंको रोकना राज्यके नियमोंका उद्देश्य है। अज्ञानता, दरिद्रताकी हालतमें सच्ची स्वतन्त्रता सम्भव नही। ग्रीनका कहना है कि 'राज्य प्रत्यक्ष तो नही, किन्तु परोक्षरूपसे ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है जिसके द्वारा व्यक्तिकी स्वतन्त्रता और नैतिकताकी वृद्धि हो सके। स्वतन्त्रता एव नैतिकताके प्रतिरोधक तत्त्वोको दूर करना राज्यका कर्तव्य है। अनिवार्य शिक्षा, मद्यविक्रयादि-निषेध ग्रीनकी दृष्टिमे अज्ञान एव प्रमादका निवारक होनेसे अत्यावश्यक है। उसके मतानुसार एक मद्यप स्वतन्त्र नहीं, परतन्त्र ही है, क्योकि इससे वह अपने विवेकका समुचित प्रयोग नहीं कर सकता। स्वच्छ स्वास्थ्यवर्धक गृहनिर्माणके लिये राज्य नागरिकोको बाध्य कर सकता है। श्रमिकोकी दयनीय दशाका सुधार भी राज्यका कर्त्तव्य है।' वर्तमान यान्त्रिक विकास एव उसके द्वारा होनेवाले आर्थिक असंतुलन तथा क्रयशक्तिका ह्रास और मालकी अधिक उपज तथा माल खपतके लिये बाजारोका अभाव आदि समस्याओका समाधान ग्रीनकी व्यवस्थासे सम्पन्न नहीं होता। अतः उसके लिये अतिरिक्त आयके वितरण और यान्त्रिक विकासके अवरोध आदिके लिये रामराज्यवादका आश्रयण अनिवार्य है। रामराज्यकी दृष्टिमें भी जनसम्मति अवश्य अपेक्षित है; क्योकि लोकरञ्जन राजाका मुख्य कार्य है। तथापि जन-स्वीकृतिके विषय सीमित ही है, निस्सीम नही। अनेकविध धर्म, दर्शन, शिल्प, कला आदि विषयोंमें जनसम्मतिकी अपेक्षा नहीं होती। यद्यपि परम्पराप्राप्त राज्य-प्राप्तिमें जन-स्वीकृति मूल नही। फिर भी जनरञ्जनकी दृष्टिसे अपने कार्योंमें जन-सम्मति या जन-स्वीकृति लेना आवश्यक है। इसी तरह जिस न्यायसे ग्रीन व्यक्तिगत पूँजीकी सत्ता मानता है, व्यक्तिगत भूमिकी सत्ता माननेमें भी वही न्याय क्यो न माना जाय? रामराज्यवादकी दृष्टिसे तो भूमि, सम्पत्ति, कल-कारखाना तथा उद्योग-धंधे आदि सभी विषयोमें 'सप्तवित्तागमा धर्म्या' के अनुसार, व्यक्तिगत वैध अधिकार मान्य हैं। शर्त यही है कि अन्याय, अत्याचार, शोषण आदिद्वारा उनकी प्राप्ति न की गयी हो; किन्तु पितृपितामहादि परम्पराके दायसे तथा गाढ़े पसीनेकी कमाई एवं मान- पुरस्कारादिसे प्राप्त की गयी हो। इसकी उपपत्ति पीछे की जा चुकी है। अन्य अंशोंमे ग्रीनका मन्तव्य रामराज्य-सम्मत ही है।