भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

१४० मार्क्सवाद और रामराज्य तो आचार बुरा है । स्वार्थ, परार्थ दोनों पृथक् होनेके कारण अनर्थकारक हैं । दोनोंमें मेल होनेसे आचारकी उन्नति होती है । स्वार्थसे परार्थ एवं परार्थसे स्वार्थ साधन होता है । सर्वप्रथम स्वार्थप्रयुक्त कलह होता है, फिर प्रत्येकका स्वार्थ परस्पर अधीन देखकर मनुष्य प्रेममय जीवन पसद करते हैं । सामाजिक आचारोंमें न्याय और उपकार मुख्य हैं । प्रत्येक व्यक्ति दूसरोंके स्वातन्त्र्यका विरोध न कर जितना और जो चाहे कर सकता है । यही न्यायका नियम है । स्पेसरके मतानुसार 'समाज और व्यक्तिका अवयवावयवीभाव है । अवयव अवयवीसे पृथक् नहीं हो सकता । जो कार्य समाजके लाभका है, उससे व्यक्ति- का भी लाभ होता है । जिस कार्यसे समाजको हानि होती है, उससे व्यक्तिकी भी हानि होती है, यही परार्थका आधार है । परस्पर विरोधके कारण समाजमे राज्य-शासनकी आवश्यकता पड़ी । प्रजामें परस्पर आन्तर भेदको बचाना, प्रजाकी बाहरी शत्रुओंसे रक्षा करना राज्यका कार्य है ।' व्यक्तिके कार्योंमें राज्यका हस्तक्षेप उसे अमान्य है । सापेक्षतावादी हेमिल्टनका कहना है कि 'हमारी मानसिक शक्तियोंसे ही सब ज्ञान होते हैं, निरपेक्ष ज्ञान नहीं होता ।' परंतु निरपेक्ष पदार्थ भी असम्भव या असत् नहीं । केवल दृश्य ही प्राणीको दिखायी पड़ते हैं । वे द्रष्टाकी अपेक्षा रखते हैं । यह दृश्य, यह गुण, अवश्य किसी पदार्थके दृश्य होंगे, परंतु वह पदार्थ अज्ञेय रहता है । दृश्य शृङ्खलाकी भिन्नतासे मूल द्रव्यमें भेद भी समझा जा सकता है । डीन मैन्सलका कहना है 'दार्शनिकोंके निश्चित ज्ञानतक न पहुँचनेके आधारपर ही धर्मकी पुष्टि की गयी है ।' बुद्धिवादी लोग धर्ममें जो कठिनाइयाँ देखते हैं वही तो विज्ञानमें भी कठिनाइयाँ हैं । फिर धर्ममें ही आपत्ति क्यों उठायी जाय ? जब एक और अनेकके दुर्भेद्य रहस्यके आगे दार्शनिक मूक हैं और सभी चीजोंकी उत्पत्तिका रहस्य नहीं जान सकते, तब ईश्वरकृत अद्भुत चमत्कारोंको न समझ पाना तो सर्वथा स्वाभाविक है । हक्सलेके मतानुसार 'अपनी रुचि एवं इच्छाओको सत्यके निर्णयमें बिल्कुल स्थान न देना चाहिये । स्वर्ग, अमरत्व आदि यद्यपि इच्छाओंके नुकूल हैं, तथापि जबतक वैज्ञानिक प्रत्यक्ष प्रमाण न मिले, तबतक उनपर श्वास नहीं करना चाहिये । प्रयोगात्मक जाँचमे जो ठीक उतरे, वही सत्य है । अनुमानमात्र पर्याप्त नहीं है । जो बातें अनुभवमें नहीं आती, उनके सम्बन्धमें वैज्ञानिकको चुप रहना चाहिये ।' वैज्ञानिक