मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished866 पृष्ठ
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विकासवाद १८३
अव्यक्त ही रह जाता है। मूल प्रकृतिकी शक्ति ही धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। उसीमें चैतन्य या आत्माका स्वरूप व्यक्त होता है।' सत्कार्यवादके समान ही इस प्रकृतिके भी कुछ नियम हे। उन्हीं नियमोके अनुसार जड जगत् और मनुष्य भी उत्पन्न होते हैं। प्रकृति जैसा कराती है वैसा ही सबको करना पड़ता है। संसार एक कारागार है, सब प्राणी उसके कैदी हैं और पदार्थोंके गुण-धर्म ही बेड़ियाँ हैं। उनका तोड़ना असम्भव है। इसीलिये, हेकलके मतानुसार 'एक अव्यक्त प्रकृति ही सब कुछ है।' यही उसका 'जडाद्वैतवाद' है। सांख्यमता- नुसार 'प्रकृतिका कार्य जड प्रपञ्च ही है, चेतन प्रकृतिसे भिन्न है।' जड सामग्रीसे ही सब वस्तुओकी उत्पत्ति हो जाती है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। सांख्यवादी भी स्वतन्त्र, व्यापक, असंग, चेतन, आत्मा और प्रकृतिके समन्वयसे ही सृष्टिप्रपञ्च मानते हैं। इसी सम्बन्धमें सांख्योंका 'पङ्गु- अंधन्याय'* प्रसिद्ध है। जैसे पङ्गु चल नहीं सकता ओर अंधा देख नहीं सकता, दोनोंका जब मेल होता है, पङ्गुको कंधेपर चढ़ाकर जब अंधेके पैर और पङ्गुके आँखका सहयोग मिलता है, तब गमनादि क्रिया सम्पन्न होती है। वैसे ही अंधेके तुल्य अचेतन प्रकृति ओर पङ्गुके तुल्य गति-शक्तिरहित चेतन पुरुष, इन दोनोंके सम्बन्धसे सृष्टि-प्रपञ्च चलता है। व्यवहारमें अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन अश्वके आधारपर ही होती है। यान्त्रिक प्रवृत्तियोंके भी मूलमें संयोजक होता है। एकत्रित सामग्री कर्ता नही बन जाती। संघात या समुदायमात्रमें कर्तृत्व नहीं हो सकता। क्षेत्ररूपी कारखानेमें मनुष्य बुद्धि, मन आदि नौकरोंसे काम करानेवाला कौन है ? एकत्रित सामग्रियाँ भी विलग न हो जायें, एतदर्थ उन्हे धागासे बाँधना भी पड़ता है, अन्यथा वे कभी भी अलग हो जायेंगी, अतः कोई नियामक चेतन परमावश्यक है।' यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'समुच्चयका गुण चैतन्य है', क्योंकि जिसमें जो वस्तु असत् है, वह कभी भी सत् नहीं हो सकती - 'नासतो विद्यते भावः' फिर भी समुच्चयोत्पन्न गुणकी अपेक्षा भौतिकवादी समुच्चयको ही चेतन आत्मा मानते हैं। परंतु जब अग्निके बदले लकड़ी, विद्युत्के स्थानपर मेघ ओर आकर्षणशक्तिके बदले पृथ्वी आदि नहीं ग्रहण किये जाते, तब यह क्यो न माना जाय कि देहादि संघातका, मन, बुद्धि आदिका व्यवस्थापूर्वक काम चलता रहे, एतदर्थ संघातसे भिन्न किसी शक्तिका अंगीकार करना आवश्यक है। भले ही उस शक्तिका अधिष्ठान अगम्य हो, परंतु उसका अपलाप नहीं किया जा सकता। 'संघातका ज्ञान स्वयं संघात ही कर लेता है।' यह कहना तो सर्वथा असङ्गत ही है। अतः संघात जिसके लिये प्रवृत्त होता है, जो संघातका ज्ञाता या प्रवर्तक होता है, उसे मानना आवश्यक है।
- देखिये सांख्यदर्शन ( ३ । ५ ) तथा सांख्यकारिका ( २१ ) ।