भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

विश्व क्या है' आदिका चिन्तन तथा विवेचन 'दर्शन' है। इसी प्रकार कुछ विद्वान् प्रकृति तथा उसके व्यापारका अध्ययन एवं उसके भीतर एकता देखनेको दर्शन कहते हैं। पर इन मतोंमे भी आंशिक सत्यतामात्र है। सभी दर्शन सभी विषयोंमें आदरणीय भी नहीं हो सकते। जैसे अंधोंने हाथीके जितने अङ्ग जिस रूपमें अनुभव किये उसी ढङ्गसे उनका वर्णन किया। न इसे सम्पूर्ण मिथ्या ही कहा जा सकता है और न पूर्णतया सत्य ही। विशेषतया पाश्चात्त्य दर्शनोंके सम्बन्धमें तो अत्यन्त वैरूप्य है। भारतीय दर्शनोंमे यद्यपि इतना अधिक वैरूप्य नहीं है; क्योंकि उनके मूल अनादि-अपौरुषेय वेद, तदाधारित शास्त्र, योगज ऋतम्भरा प्रज्ञा तथा लौकिक प्रत्यक्षानुमान हैं तथापि यहाँ भी सभी विषयोंमे सभी ऋषियोंका समान आदर नहीं, अपितु जिस विषयमें जिस ऋषिने धारणा, ध्यान, समाधि आदिद्वारा तत्त्वानुभूति प्राप्त की, उसी विषयमे उसका सार्वभौम आदर है। जैसे शब्दके सम्बन्धमे पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि आदिका एवं वाक्य- विचार आदिमें जैमिनि, व्यास आदिका। पाश्चात्त्य-दर्शनोंमें अधिकांशका जन्म कुतूहल-बुद्धि एवं ज्ञान- पिपासा-शान्तिकी दृष्टिसे ही हुआ है। अनेक पाश्चात्त्य-दर्शनोंका प्रादुर्भाव राजनैतिक उद्देश्यकी पूर्तिके लिये भी हुआ है, किन्तु भारतीय दर्शनोंका अन्तिम उद्देश्य दुःख-निवृत्ति, मृत्यु-विजय तथा मोक्ष-प्राप्ति ही है, अवान्तर उद्देश्य अर्थ- काम-धर्मार्जन भी है। वेदान्तमतमे ज्ञानस्वरूप आत्मा निर्विकार है। मन, अन्तःकरण आत्मासे भिन्न प्राकृतिक है। चित्त, अहंकार आदिके समान ही पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च- कर्मेन्द्रियाँ भी प्रकृतिके सूक्ष्म तत्त्वोंसे ही बनी हैं। स्थूल देहसे भिन्न पञ्चप्राणसहित उक्त मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार एवं कर्म-ज्ञानेन्द्रियोंको मिलाकर सूक्ष्म या लिङ्ग शरीर कहा जाता है। स्थूल देहके नष्ट होनेपर भी यह सूक्ष्म देह नष्ट नहीं होता। सृष्टिसे लेकर प्रलयकालतक यह सूक्ष्म देह रहता है। इसीके आधारपर व्यापक आत्माका गमनागमनादि बनता है। इससे भिन्न एक रजस्तमोलेशानुविद्ध अतएव अविशुद्ध सत्त्वप्रधान अविद्यारूपी कारण शरीर भी मान्य है, जिसका तत्त्व साक्षात्कारसे ही बाध होता है। इस तरह वह अनादि, सान्त है। मूल प्रकृति भी अनादि, सान्त है। सम्पूर्ण प्रपञ्च पञ्चभूतात्मक है। उन भूतोंकी ग्राहक इन्द्रियाँ भी सूक्ष्म भूतोंका ही परिणाम हैं। भिन्न कारणोंमें स्वकार्यानुकूल शक्ति होती है। इसी तरह ब्रह्ममें भी सर्वप्रपञ्चोत्पादिनी शक्ति होती है। इसीको मूल प्रकृति कहा जाता है। चेतन ईश्वर सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान् एवं सर्वव्यापी होता है। कर्माके अनुसार जन्म-मरणके समान ही संसारका सृष्टिप्रलय होता है। संसार-