मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ मार्क्सवाद और रामराज्य वायुका भक्षण करते हैं। अन्य प्राणियोंका क्रम इसके विपरीत है। इसी तरह वनस्पति एव पशुओका कोई भी शरीरसम्बन्धी उत्पादक सम्बन्ध कुछ भी प्रतीत नहीं होता। अतः मनुष्य न तो पशुश्रेणीका है और न वनस्पतिश्रेणीका ही, अतः तीनोका ही कार्य-कारणभाव सर्वथा असंगत है । वानर-कक्षाकी जो आठ विशेषताएँ दिखलायी गयी हैं, वे केवल वानरोकी ही नहीं, उनमें आधीसे अधिक सब प्राणियोंमें पायी जाती हैं। जो दो-चार विशेषताएँ हैं, वे मनुष्यको पृथक् ही सिद्ध करती हैं। गर्भनाल भैसका भी लगा रहता है। अँगूठेके घूमनेसे भी बदर मनुष्यसे भिन्न जातिका सिद्ध होता है। वृक्षोंपर तो चिड़ियाँ और कीड़े भी रहते हैं। दूधके और स्थायी दाँत गाय, भैंस आदिके भी होते हैं। दाँतोकी संख्या अन्य पशुओमें भी अलग- अलग होती है। इसी तरह पाँच अँगलियाँ गिलहरीके भी होती हैं। दो स्तन बकरीके भी होते हैं। इसी तरह मस्तिष्ककी बड़ाई भी मनुष्यता नहीं है। आधुनिक वैज्ञानिक भी चींटीको बहुत बुद्धिमान् मानते हैं, उसकी-जैसी प्रबन्ध-शक्ति अन्यत्र नहीं देखी जाती। इससे 'बड़े या स्पष्ट मस्तिष्कसे ही बुद्धि और विचारोंकी उत्पत्ति होती है' यह नहीं कहा जा सकता । वस्तुतः लीमर, मार्मोसेट आदि प्राणी स्वतन्त्र योनियाँ ही हैं। विकासक्रम दिखलानेके लिये ही उन्हें वानरकोटिमे मान लिया जाता है। इनका परस्पर वंश नहीं चलता, अतः ये वानरजातिके नहीं हैं। वनमानुषोका भी बदरके साथ नाममात्रका ही मेल है, वस्तुतः इनका एक-दूसरेके साथ कुछ भी वास्ता नहीं है । यदि गिबनकी माता अपने बच्चेका मुँह धोती है तो गाय-भैस चाट-चाटकर ही अपने बच्चेको साफ़-सुथरा रखती है। चिड़िया दाना लाकर अपने बच्चोको खिलाती है। यदि चिम्पेञ्जी घाव दबाकर खून बंद करनेकी चेष्टा करता है, तो कुत्ता भी घास खाकर जुलाब लेता और चाटकर घावोको ठीक कर लेता है। हाथी भी अपना इलाज आप कर लेता है। चिम्पेञ्जी नौ महीनेके बालककी बुद्धि रखता है, परंतु चींटी सब संसारका प्रबन्ध करनेकी बुद्धि रखती है। अतः मनुष्य वनमनुष्यकी श्रेणीका भी नही। मस्तिष्कका सिद्धान्त चींटीके दृष्टान्तसे कट जाता है, चींटीको मस्तिष्क होता ही नहीं। यदि चींटीको मस्तिष्क हो तो भी चिम्पेञ्जी आदिकी अपेक्षा तो नगण्य ही होगा। जब चींटी मस्तिष्कके बिना ही सब काम करती है, तब 'मनुष्य चौड़े मस्तिष्कसे ही सब काम करता है' यह नहीं कहा जा सकता। इसी तरह दो पैरपर सीधे खड़े होनेसे आँतकी बीमारी होनेकी कहानी भी व्यर्थ है । यदि खड़े होनेसे वह बीमारी होती, तो करोडो वर्ष पहले भी यह बीमारी होना और फिर इसके डरसे मनुष्य सीधा खड़ा क्यो होता ? वस्तुतः