मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै । इतना ही क्यों ? उसकी ही सत्तासे अन्य पदार्थ सत्तावान् होते हैं । उसीकी स्फूर्तिसे इतर पदार्थोंमें स्फूर्ति होती है । जैसे दर्पणभानके अनन्तर ही दर्पणस्थ प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है, इसी तरह अथवा आलोककी प्रतीतिके अनन्तर ही रूपकी प्रतीति होती है उसी तरह प्रमेय, प्रमाण तथा प्रमाता तीनोंकी प्रतीतिसे पहले ही सर्वभासक भानकी प्रतीति होती है । प्रकाश सम्पर्क होनेसे अथवा प्रकाशस्वरूप होनेसे वस्तु प्रकाश होता है । प्रमाण बिना प्रमेयसिद्धि नहीं 'होती । प्रमाण भी प्रमाताके पराधीन होता है । प्रमाता स्वभिन्न प्रमेयकी प्रमितिके लिये प्रमाण ढूँढता है । अपनी प्रमितिके लिये प्रमाणकी आवश्यकता नहीं समझता । यदि प्रमाता भी प्रमाणसिद्ध माना जाय तब तो वह प्रमेय- कोटिमें आ जायगा । फिर उसका प्रमाता कोई अन्य आवश्यक होगा, उसका भी अन्य, फिर उसका भी अन्य प्रमाता आवश्यक होगा । इस तरह अनवस्था- प्रसक्ति होगी । एक ही प्रमाता स्वयं प्रमाता और स्वयं प्रमेय नहीं हो सकता, क्योंकि एकमें कर्मकर्तृभाव नहीं बन सकता । किसी भी वस्तुका प्रागभाव या प्रध्वंसाभाव सिद्ध करनेके लिये प्रमाता प्रमाण या साक्षी अपेक्षित है । साक्षीविहीन भाव या अभाव कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता । सुषुप्तिमें प्रमाता प्रमाणका भी अनुपलब्ध सिद्ध है । परंतु सर्वभासक बोध या संवित्का प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव या अत्यन्ताभाव कुछ भी नहीं सिद्ध होता । बोधाभावका बोध नहीं तो बोधाभाव सिद्ध नहीं हो सकता । बोधाभावका बोध है तो बोधाभाव भी कैसे कहा जा सकता है ? इस तरह यह अतीत अनागत अहोरात्र, पक्ष, मास, वर्ष, युग, कल्प सब देशकालका भासक है, स्वयं अनाद्यनन्त है । बीजसे पहले अङ्कुर, अङ्कुरसे पहले बीज होता है । जागरणसे पहले सुषुप्ति ( निद्रा ) एव उससे पहले जागरण होता है । प्राणी जागनेके बाद सोता है और सोनेके बाद जागता है । इसी प्रकार जन्म-मरण, सृष्टि-संहार तथा जन्मों और कर्मोंकी परम्परा अनादि है । संसारमें देखा ही जाता है कि कारणमें विलक्षणता हुए बिना कार्यमें विलक्षणता नहीं होती । रेल, तार, रेडियो आदि विलक्षण कार्योंके लिये विलक्षण हेतु अपेक्षित होते ही हैं । इसी तरह देव, मनुष्य, पशु आदि उच्चावच योनियोंमें जन्म बिना धर्माधर्मरूपी कर्मोंकी विलक्षणता सम्भव नहीं है । लोकमें भी भले कर्मोंका भला फल और बुरे कर्मोंका बुरा फल होता है । ठीक इसी तरह धर्म अधर्मके वैचित्र्यसे ही जन्मोंमें वैचित्र्य होता है । कोई भी शासक शासनके लिये शासन-विधान आवश्यक समझता है । सुतरा सनातन परमेश्वर भी सनातन जीवोंपर शासन करनेके लिये सनातन विधान आवश्यक समझते हैं । सनातन जीवात्माओंको सनातन परमपद प्राप्त करानेके लिये सनातन परमात्माने अपने सनातन निःश्वासभूत सनातन वेदादि