मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविकासवाद २१७ मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः । शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नगः ॥ प्रत्यक्षानुमानादिमूलक मति जहाँतक जाती है, वहाँतक जानेवाले वानरादि पशु होते हैं । परंतु प्रत्यक्षानुमान एव शास्त्र जहाँतक चलते हैं, वहाँतक चलनेवाला प्राणी ही नर होता है । हाँ, पौरुषेय वचन प्रत्यक्षानुमानादिमूलक होते हैं । पर अपौरुषेय वचन स्वतन्त्ररूपमे प्रमाण होते हैं । जैसे रूपग्रहणमें नेत्र स्वतन्त्र प्रमाण होता है, वैसे ही धर्म-ब्रह्मादिग्रहणमें वेदादि शास्त्र स्वतन्त्र प्रमाण होते हैं । इस तरह प्रत्यक्ष, अनुमान तथा वेदादि आगमोंद्वारा यही सिद्ध होता है कि शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वरसे ही विश्वकी सृष्टि एव उसकी व्यवस्था होती है । विचित्र सूर्यमण्डल अपने आप कैसे बन गया ? उससे चन्द्रमण्डल, भूमण्डलके टुकड़े कैसे टूटे ? अब ऐसे टुकड़े क्यों नहीं टूट रहे हैं ? अब वानरसे मनुष्य क्यों नहीं उत्पन्न होते, इन अतीत इतिवृत्तोंमें क्या प्रमाण है ? केवल कुछ मनुष्योंकी दिमागी कल्पनाको छोड़कर इन तत्त्वोंका क्या आधार है ? आर्ष विज्ञान् अपौरुषेय शास्त्रोंके सामने इन कल्पनाओंका क्या मूल्य है ? इन कल्पनाओंकी निस्सारता इसीसे स्पष्ट है कि अग्नि, सूर्य, इन्द्रादि देवता उपयोगिताके आधारपर माने गये हैं । परंतु यह कोई भी नहीं कह सकता कि जिसका उपयोग करना हो उसकी पूजा भी करनी चाहिये ।' पूजा तो उसी दशामें होती है, जब दृश्य जडवस्तुसे भिन्न कोई चेतन वस्तु मान्य होता है । आस्तिक लोग उपयोगी अग्नि आदिमें एव अनुपयोगी पाषाण आदिमें भी चेतन अधिष्ठान देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं । इसी तरह इन्द्र या ईश्वर आदि- की कल्पना भी भीरु प्राणीकी भीरुताका परिचायक नहीं, किंतु भय, शोक, मोह, सुख-दुःख आदि प्रापञ्चिक भावोंसे ऊपर उठे हुए महापुरुषोंद्वारा परम तथ्यका ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा साक्षात्कार है । निर्विकल्पसमाधिदशामें ईश्वरतत्त्वका साक्षात्कार होता है । एव दार्शनिक दिव्य तर्कोंद्वारा अशृङ्खल भौतिकवादी कुतार्किकोंके अखर्व गर्वोको चूर करके अध्यात्मवादी आत्म परमात्मवाद सिद्ध करते हैं । वशिष्ठ, व्यास, कण्व, गौतम, श्रीहर्ष, उदयन, कुमारिल आदिकोंके महान् तर्क आज भी नास्तिकोंके लिये दुर्भेद्य हैं । विकासवाद और जाति जल, वायु एव देशोंके प्रभावसे रंगमें परिवर्तन होना प्रत्यक्ष अनुमान एव शास्त्रसे भी सिद्ध है । कफ, वात, पित्तकी प्रधानता-अप्रधानताने भी रंग, रूप, स्वभावमें भेद होना शास्त्रसिद्ध है । जैसे संकल्पों, विचारों एवं वातावरणोंसे रजस्वला स्त्री प्रभावित हो, स्त्री-पुरुष जैसे देश, काल,