भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 235

२२० मार्क्सवाद और रामराज्य और उसके अनुसार ही ह्रास भी मानना पड़ेगा । तब तो ह्रास-विकासका चक्र ही समझमें आ सकता है । किसी पीढ़ीमें अकस्मात् परिवर्तन विकासवादमें परिगणित हो सकते हैं । परंतु संकल्प, धर्माधर्म, वर-शापादिसे परिवर्तन इस विकासवादमें नहीं आ सकता । विकासवादियोंका यह कहना भी युक्तिविहीन है कि 'किसी जातिके किसी पीढ़ीमें अकस्मात् आविर्भूत होनेवाले गुण-दोष दोनो ही प्रबल होते हैं । खतरनाक अवस्था आनेपर दोषवाली जातिके लोग नष्ट हो जायेंगे, परंतु गुणवाली जातिके लोग और जातियोंके नष्ट होनेपर भी बचे रहेंगे।' तब ये विशेषताएँ बिना कारणके कैसे होगीं ? फिर जब अकस्मात् ही सब कुछ होना है, तब आकस्मिक दोषवाली जातिके नष्ट हो जाने, गुणवाली जातिके जीवित रहनेका ही नियम कैसे रहेगा ? शास्त्रीय विचारधाराके लोगोंका तो कहना है कि किसी भी परिवर्तनमें हेतु अवश्य है और जो विशेषताएँ आगन्तुक हैं, उनको मिटाना भी अनिवार्य है । उत्तम दृढ हेतुसे व्यक्त विशेषताएँ कुछ दीर्घकालतक ठहरती हैं । निम्नश्रेणीके हेतुसे उत्पन्न विशेषताएँ शीघ्र ही नष्ट होती हैं । कुष्ठ, प्रमेह, मृगी आदि ऐसे कितने ही रोग हैं, जो प्रारब्ध एवं अन्यान्य बाह्य हेतुओसे उत्पन्न होते हैं और फिर उनकी परम्परा चल पड़ती है । कितने रोग ऐसे भी होते हैं कि जिनकी परम्परा नहीं चलती । वैसे दोषोका भी ज्ञान फल-बलसे ही जानना चाहिये । रूप-रग एव मनपर वाह्य परिस्थितियोंका प्रभाव भी अवश्य पडता है । मैथिलो, पजाबियो, द्राविड़ोपर देश, जल, वायुका प्रभाव अवश्य है । पवित्र, अपवित्र वस्तुओका सेवन, वैसे वातावरणका सेवन अवश्य मनपर प्रभाव डालता है । भोग, मद्य आदिकेसेवनसे मनपर विकृति आती ही है । 'केवल आधुनिक विकासवादियोंको मान्य नहीं है, इतनेहीसे कोई बात अयुक्त नहीं हो सकती । फिर जो आकस्मिक परिवर्तन माननेवाला है, उसकी दृष्टिमें किसी भी हेतुका सम्मान कैसे हो सकता है ? इसके अतिरिक्त तीव्र पुण्य-पाप, ऋषियो, देवताओके वर-शापसे भी विचित्र परिवर्तन शास्त्रसिद्ध है । रचनामे अलौकिक ईश्वरीय शक्तिका हाथ होते हुए भी चित्रकारके समान परमेश्वरमें अल्पज्ञता एव अभ्याससापेक्ष कुशलताकी आपत्ति नहीं होगी । मनुष्यजातिकी धीरे-धीरे उन्नति करनेपर ही उसकी न्यूनता नहीं, क्योंकि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भी परमेश्वर जीवोंकी उन्नति अवनतिके सम्बन्धमे उनके कर्मोंपर अवलम्बित है । जीवोंके अङ्गोंके सौन्दर्य, माधुर्य आदि गुण- गणोंके होनेमे जीवोके कर्म भी हेतु होते हैं, कर्मानुसार ही जीवोको रूप, रग, सौन्दर्य, बुद्धि आदि मिलेगी । इतनेसे ही सृष्टिकी पूर्णता-अपूर्णताका निर्णय करना निरर्थक है । जब जीवोके पुण्य विशेष होते हैं, तब उनका उत्तम विकास होता है,